बुधवार, नवंबर 30, 2016

प्रतिरोध की कविता

प्रतिरोध की कविता
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यह कविता नहीं है ..
यह नाटक भी नहीं है..
यह कविता और नाटक के बीच झूल रही रौद्र बतकही है ...
इसमें पात्र तो है पर कोई अभिनेता नहीं.. और न हीं अभिनय..

नाटक के पात्र की तरह
एक अदना सा,छोटा आदमी
प्रवेश कर..
जब अभिनय की भंगिमा शुरू करता है.. तब हमसब हतप्रभ, भौचक्का हो चुपचाप तमाशा देखते हैं ..
कब यह तमाशा-किस्सागोई
सच्चाई के बेहद करीब
यथार्थ में ले जाता है
हमें पता ही नहीं चलता ...

लोग दिखते हैं ..
भीड़ भी दिखती है ..पर सब निहत्थे..
किसी के हाथों में बंदूकें नहीं थी ...!
न हीं खंजर ...!
और न हीं नश्तर..
जो डरा सके किसी को ...!
वह दुश्मन की तरह लग रहे थे..पर थे नहीं...!
उनके दुश्मन थे कई..
सरकारें भी उनके खिलाफ थी..
क्योंकि वो सरकार की बात नहीं करते थे...
गण के उस हाशिये के हिस्से की बात करते थे..
जहाँ सरकार नहीं पहुँच रही थी..

जंग में सारी आताताई सेना झोंक दी थी सरकार ने उनके खिलाफ..
पुरे खलुस और मरहूद के साथ...

उस निहत्थे मानुषों के विरुद्ध..
सरकार ने तलवारें तान रखी थी..
मिसाइलों का मुख भी उसकी ओर था.. समस्त राजशाही की ताकत उनके खिलाफ खड़ी थी
पर वे डिगे नहीं..
और न हीं हारे--
और न हीं टूटे...!

उनकी आवाज में इतनी असीम ताकत थी
कि पुरा गण खड़ा था उनके साथ
निहत्था ही...!
उस आतातायी, तानाशाही सत्ता के खिलाफ...
जो विरोधियों को कुचलने में मार्क्सवादियों से भी क्रूर थी...
हवा में उठे हरेक हाथ को काट दिया करता था वो..
उस क्रूर आतातायियों के कानों ने हमेशा सुने थे ...
जयकारों की आवाज..
चाटुकारों की आवाज..
लोलुपकारों की आवाज..
व्यापारों की आवाज...
पर...!!
आज उस निहत्थे के आवाज के खिलाफ..
सेना चुप थी---गण बोल रहा था...!
राजा चुप था--प्रजा बोल रही थी...!
मंत्री चुप थे-- परिषद् बोल रही थी...!
उन निहत्थों की आवाज में
इंकलाब थी उस देश की...
जहाँ बन्दूकें बोल रही थी जनाब...!!

मंगलवार, अगस्त 18, 2015

रेत के भुरभुराहट की तरह नहीं ढ़हता प्रेम ....!!

तुम सिर्फ रेत नहीं हो
जो फिसल जाओगे वक्त के साथ...

तुम वह भी नहीं
जो ढ़ह जाता है
एक छोटी सी चोट से...

या वह
जो भुरभुरा कर
बदल लेता है अपना वजूद...

तुम हवा भी नहीं हो
जो बहा ले जाओगे हमें
इस समंदर से दूर...

कि...
सागर के प्रेम से पगा हूँ मैं

रत नमी से इस कदर

कि...
तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते

तुम सूखा भी नहीं सकते
धूप में मुझे

एहसास से इस कदर तीता हूँ मैं
कि...
तुम भी गीले हो जाओगे
मेरे साथ साथ

तुम मुझे बहा भी नहीं सकते
क्योंकि मैं जुदा नहीं होना चाहता
तुमसे कभी
संग संग चलना चाहता हूँ अंत तक

रहता हूँ तुम्हारे वजूद के साथ ही

हां! अगर मैं मिटूं
या बहूँ
या सुख जाऊ

तो समझ लेना

प्रेम का झरना सूख गया होगा मेरे अंदर
या कोमा में चली गयी होगी याद मेरी
या सूली पर चढ़ा दी गयी होगी फिर कोई मोहब्बत
या चुन दिया होगा किसी मुग़ल ने फिर से
...........................................

कुछ नहीं है मेरे पास...
सिवाय तेरे...!

यह जो "तुम" हो न ...
यही तो ख़ास है
मेरी कुल जमा पूँजी
मेरा-तुम्हारे का एहसास से भरा
बस.....!

--राकेश पाठक

बुधवार, जुलाई 29, 2015

गंगा के तट पर उपजी एक प्रेम कथा का कुछ भाग


याद है तुझे ? जब पहला ख़त भेजा था मैंने ..!
हाँ !!
तब भी क्या समय था ! तेरे शब्दों और ख्यालों में ही तो जीता था मैं ..
!!!!
कितने ही पत्र लिखे मैंने ...!
आरजु विनती कर करके थक गया था मैं..!
पर तुम कहाँ सुनती थी ..?
पर आज देखो न ...साथ हो तो लग ही नहीं रहा ..की तुम (वही) हो
कैसे झिड़ककर चल देती थी तब....माय फूट कहकर ..!
आँखों में नमी लिए उदास सा फिर कुछ लिखने लग जाता था मैं .. एक आस के साथ..!
जानती हो ...?
तुम्हारी माय फूट कहने का जो स्टाइल था न उफ़्फ़!!!
गुस्सा दिखाते हुए..जब पैर पटक कर, झिड़कते हुए तुम निकल जाती थी और मैं गीले आँखों से तड़प उठता था।
सच कहूँ तो तुम्हारा "माय फूट" कहने की जो अदा थी न उसी से मुझे प्यार हो गया था।
यह सुनना की फिर कुछ लिखकर पकड़ा देता था नीरू को ...
मनुहार ..मान के साथ दे देना उसे ..!
मेरी आँखों की नमी देखकर वो भी मना नहीं कर पाती थी ..!
पर तुम भी न कितना अभिनय करती थी ...?
पहले पूरा पत्र पढ़ना...पढ़ते ही तेरा "हूँ" करके पैर पटकना ....
तुम्हें कैसे पता यह सब ..?
नीरू ही तो बताती थी यह..
यही जो चीज थी न जिस से मुझे लगता था की कहीं न कहीं कुछ तो अंकुरित हो रहा है मेरे लिए।
अच्छा ...!!
जब प्यार नहीं था तो मेरे पत्र पढ़ती क्यों थी ..?
जानते हो ..!
आज पहली बार कह रही हूँ तुमसे ...!
सचमुच में मैं तुमसे प्यार करने लगी थी ...!
तुम्हारे शब्द भी न ..!!!
उफ़्फ़ वेवश कर देते थे मुझे ..
और यही मैं नहीं चाहती थी कि वेवश सा दिखूं किसी के आगे ...!
पैर पटककर निकलना अभिनय मात्र नहीं था सिर्फ ..!
मेरे वजूद को लील जाने वाला अहं था मेरा..!
मेरा अहं ..मेरा गुरुर का कारण ये पुरुष ही तो थे ..
उनके निगाहों की टकटकी से उपजी हुई ..झूठा दर्प ...
इसे मैं अब समझ पा रही हूँ ..!
पुरुषों का ऐसे एकटक देखना मुझे अच्छा लगता था।
इसके बिना कहाँ मैं ...?? कोई देखे न तो बेचैन हो जाती थी मैं ..! मुझे लगता था मेरे इर्द गिर्द ही तो दुनिया है इन पुरुषों की ।
पागलपन के हद तक तड़पते देखना चाहती थी मैं इन्हें..
पर यह जो तुम्हारे भेजे ख़त ...उनमें लिखे शब्द ऐसे थे ..की मैं बेचैन हो जाता था।
मेरे अहं ...वज़ूद के निष्कर्षण के ध्रुव थे यह शब्द।
पर आज कहूँ नरेन् ..!!
शायद तुम मेरे लिए ही बने थे ...
तुम न होते तो मैं भी न होती..!!
तुम... "तुम" हो
और मैं ... "मैं"...!
यही कहा करते थे न !
पर "तुम" न होते
तो हम भी न होते !!
न यह मेरा अहं
अब मैं इसलिए हूँ
की तुम हो ....
टूट कर कहाँ कोई जी पाता है किसी से ??
साथ छोड़कर कहाँ कोई जा पाता है कभी ..??
यादों को पकड़े रहते है साथ साथ
जीवन भर..
सांसपर्यन्त...
फिर एक समय आएगा
जब न तुम "तुम" रहोगे
और न मैं "मैं" रहूँगा..!!
"मैं" होना अहं का होना है बस ..!
पर "हम" होना सब होना है ..!
जीवन चक्र के अगली चरण की एक कड़ी..!!
.....राकेश
क्रमशः
— feeling गंगा तट की प्रेम कथा का संवाद दृश्य. 

एक पिता का पत्र... पिता के नाम .....!!!


फादर्स डे पर पिता को यह पत्र और कविता लिखी थी। आज यहाँ .......!!!
आज फ़ादर्स दे है। पिताजी आज मैंने आपको कोई विश नहीं किया... न बधाई दी। फोन किया भी तो सिर्फ प्रणाम कहकर हाल चाल पूछ कर रख दिया बस इतना ही तो कह पाता हूँ इन तारीखों में। बचपन से लेकर आजतक कभी भी विश नहीं कर पाया आपको। मुझे दिखावा ही तो लगता रहा है यह सब। बनावटीपन लगता है ये सब करना मुझे ....आपके साथ। मेरे लिए तो रोज ही फादर्स डे है तो किसी दिन विशेष को ही क्यों?? कभी भी मैं सहज कहाँ महसूस कर पाया इन तिथियों को..? शायद आप भी कभी उतने सहज नहीं लगे...बस जो कह दिया स्वीकार कर लिया। इस मामले में अर्चना सबसे अव्वल रहती थी ...और आज भी है..पिताजी लगभग रोज आपसे बातें होती है और रोज ही पूछता हूँ आपसे कैसे है ? और हमेशा की तरह वही जबाब की ठीक हूँ बिल्कूल..!
पिताजी मैं 2005 से ही घर से बाहर हूँ। नौकरी और कैरियर के चक्कर में। उलझता चला गया लगातार किसी न किसी कार्य में । फिर शादी...बच्चे ...उनकी ज़रूरतें और अब अपनी नयी गृहस्थी सवांरने में उलझा हूँ। आप अकेले पड़ गए है अब। यही कहते है न ?? छोटा अनीश भी कहाँ है अब गावँ में ...वो भी दूर है कानपूर में... नित्य के झंझटों में फंसा पड़ा हुआ... मुझे मालूम है की जब दो दिन फ़ोन नहीं करता हूँ तो मम्मी कितना बेचैन हो जाती है ...चिंतित हो कैसे कहती है मन बड़ा उद्विग्न है आज। बात कीजिये न ...! तब आपलोगों के जुड़ाव की तीव्रता और स्नेहासिक्त हाथ की नमी यहाँ महसूस कर मैं भी तो बेचैन हो जाता हूँ।
पिताजी आप जानते है कि मैं आप से कभी कुछ नहीं कह पाता था और न आज भी कह पाता हूँ....यहाँ तक अपने मन की बात भी । माँ ही माध्यम होती थी कुछ कह पाने का और शायद आज भी वैसा ही कुछ है मेरे भीतर। कुछ कह पाने का झिझक आज भी उसी रूप में है। न जाने क्यों कुछ भी मांग नहीं पाता आपसे..? ऐसे स्वतः इतना कुछ देते रहे है कि कभी जरुरत ही नहीं हुई।
आज जब दो बच्चों का पिता हूँ तब समझ पा रहा हूँ कि बेटे की ममता और दूर होने की तड़प क्या होती है। जुड़ाव क्या होता है और उस जुड़ाव में दूरी कितना कष्ठप्रद होता है। यह कविता शायद उसी बेचैनी, कष्ठ और मनोभाव से उपजी हुई है जो एक पिता अकेले में महसूस करता है। जो मैं कभी कह नहीं पाया वह इस कविता में व्यक्त हुई है ...एक पिता का दर्द और तड़प जो मैं अब समझ पाया ...एक पिता होने के बाद....!
पिता ....!!
रोज सुबह सुबह मेरी चीजें ग़ुम हो जाती है
कभी सिरहाने रखा चश्मा ..
तो कभी तुम्हारी दी हुई घड़ी..
या किंग्सटन का वह पेन..
या चाभी का वह गुच्छा ..!
जिसमे तेरे बचपन के खिलौने का बॉक्स अंदर बंद पड़ा है..!
पहले वो चश्मा ही है जो
सुबह उठते ही सिरहाने ढूंढता हूँ..!
ताकि उजास के बीच पढ़ लूँ ..
तुम्हारा भेजा कोई ख़त..
या कोई मेल..
या एस एम् एस..
पर हर दिन की तरह ही
टल जाता है ..
अगली उम्मीद पर .
या अगले दिन के इंतज़ार में ..!
यह चश्मा भी है न..!
तेरी मीठी याद से ही तो जुड़ा है..!
याद है..!जब डॉक्टर ने कहा था
चश्मा ले लीजिये अब
तब तपाक से तुमने कहा था ..
मेरे गुल्लक में बहुत से पैसे है
उसी से चश्मा ख़रीद लो न पापा ...!!
बर्थ डे गिफ्ट की तरह ..
जो देते रहे हो हर साल मुझे..!
आज मेरी ओर से ले लो न पापा..!!
मुस्कुरा कर तेरे इस भोलेपन पर मर मिटे थे हम
यही तो है तेरी यादों का इडियट बॉक्स...
जो अक़्सर जेहन में आते ही कोर गीले हो जाते है मेरे ..!!
पर न जाने क्यों....
दूरियों से..अपनों का संवाद भी...
कितना दूर होता जा रहा है अब...!!
जब गए थे...तो रोज ही बात होती थी ..!
पर दूरियों..ने शायद पीढ़ियों के बीच
एक लकीर खींच दी हो ..!
व्यस्तताओं के दरमियाँ की ...!!
जानते हो
रोज सुबह सिरहाने और भी कई चीजे गुम हो जाती है मेरी
तुम्हारी दी हुई वह घड़ी ..
और उधार लिया हुआ या माँगा हुआ वक्त भी..
दोनों मुझसे आँख मिचौली करते है रोज..!
पर मैं हूँ की वक्त को ही बाँध रखा है ...
घडी की सुइयों के साथ..
यादों के बीच अटकाकर ..
पर कब तक ??
कोई न कोई घड़ीसाज आकर
बंधे हुए वक्त को फिर से दुरुस्त कर देगा..!
रह जायेगी तो फिर वही इडियट बॉक्स में जमा तुम्हारी यादों का गुणसूत्र
जिस में निषेचन का न तो कोई भविष्य है
और न ही हम दोनों के इंतज़ार के इंतहा का कोई अंत ही इसमें..!
टेबल के दराज में फड़फड़ाते पीले लिफाफे पर दर्ज
होस्टल का तेरा अस्थायी पता का हरेक हर्फ़......
बेतरह याद है आज भी मुझे...!
इंतज़ार भी है किसी ख़त का ...
आ जाये शायद फिर ??
चीजे जरूर गुम हो रही है ...
और रोज अपनी जगह से
एक परत भी स्मृतियों का उधेड़ दे रही है
पर अगर कुछ गुम नहीं हो रही है तो वो है तेरी अल्हड़पन की यादें
शरारतें और बुना हुआ याद सहर...!!
जानते हो ..माँ रोज कहती है बदल लो अपनी आदतें ...
अपने जीने के तरीके
आखिर क्या है जो रोज ढूंढते रहते हो
अनु की आलमारी में ..
जानते हो तेरी सभी चीजे कैसे करीने से लगा रखी है ज्यों की त्यों ...
जहाँ है वही है आज भी ..
वह तेरी ड्राइंग की कॉपी
जिसपर स्कूल के टीचर ने कभी एक्ससिलेन्ट लिखा था।
वह ट्रैक शूट भी
जिसे पहनकर तुमने कॉलेज में शील्ड जीती थी
शील्ड को रोज ही छूकर तलाशते है तुम्हें ..
शायद तुम्हें याद नहीं हो
पर जब तुम छोटे थे
मेरी उंगली पकड़ जिद्द पर अड़ जाते थे
गुड़ में पगी गुझिया के लिए
बिना लिए मानते कहाँ थे तुम ..?
वारिश हो या धूप
रोज का यह नियम था तेरा
आज भी रोज गुजरता हूँ
हलवाई के उस दुकान के पास से
पर कुछ भी नहीं खरीद पाता ...सिवाय आँसू के ..
जब वापस घर लौटता हूँ
तेरी माँ भी सुना देती है दस बात...
ओह ...!!!
और फ़फ़क पड़ती है वो भी
कुछ कहते हुए...
उन्हीं यादों से गुजरते हुए ....
एक सिलसिला सा है यह रोज का..
आलमारियों में भरे है गुब्बारों के पैकेट
और हैप्पी बर्थ डे वाली रंगीन मोमबत्तियाँ भी
अमूल के डब्बे में रखी
मॉर्टन टॉफी का एक्सपायरी डेट कब का निकल चूका है रखे रखे ही
पर पड़ी है यथावत यो ही ....!
तह की हुई गुजरी यादों के साथ
जीवन गुजारना कितना मुश्किल होता है
एक पिता के नाते मैं अब जान पा रहा हूँ
स्मृतियों के ऊँची दीवारों में कैद
आख़िर कब तक जी पायेगा ..?
बच्चा होता हुआ तेरा यह बाप ...
कभी कभार ही सही एक ख़त लिख दिया करो
या कोई मेसेज भेजकर ही ढूंढ़ लेना अपने
पापा का मुस्कुराता चेहरा
जो कभी तेरे स्कूल के बाहर
धूप में खड़े हो
हँसता हुआ मिल जाता था
शायद
तब मेरी कोई भी चीज गुम नहीं होगी
कही से ...कभी भी ...!

हाँ मैं बेटी ही हूँ जो मार दी जाती हूँ......!!!!!


एक रोज सोया ही था
कि..
रुई के फाहों से घर भर गया था मेरा...
सफ़ेद सफ़ेद...
नर्म नर्म...
मुलायम मुलायम...
चारों ओर...
और जागते ही
खो गया था मैं
झक सफ़ेद उन फाहों में...
ये सफ़ेदी
ख्बाब थे कभी यहाँ के...
स्वर्ग था धरती का यह...
लग जाता था बाहर जमघट
इन उजले फाहों के साथ ही
इन बर्फ से हूरों का बूत बनाकर
खूब बातें करते थे....परियों के देश की...
कि कैसे भेष बदलकर लुटेरा परियों को ले जाता था......छीनकर यहाँ से दूर ......!
रख आता था अँधेरे परकोटे पर 'पर' काटकर...
फिर न तो..वह भाग पाती थी और न ही
जी पाती थी
रो रो कर जीना उनकी नियति बन जाती थी...!
हम रोज सोचते थे
कभी उन परियों के बारे में...
तो कभी उस राजकुमार के बारे में...
असीम ताकतों से भरा...
सुन्दर सजीला नौजवान...
हवा से बात करते घोड़ों पर सवार
दक्ष तलवारबाज
जादुई ताकतों से लैश
जो रहबर की तरह आएगा
और बचा ले आएगा उन परियों को
जो दूर कहीं .....
कैद कर रखी गयी है अबाबिलों द्वारा...!!
ये जो सफ़ेद फाहे बरसते है न...??
हर साल आसमान से...
दरअसल यह
उन परियों के आँसू भरे संदेशे होते थे
उस राजकुमार के लिए...
माँ भी यही किया करती थी हर एक साल
बर्फ गिरते हुई घरों के बाहर
जमघट लगा...
बनाने लगती थी
पुतले
परियों और राजकुमार के किस्सों वाले
वैसे ही बूत......!
कि...
इन बुतों से निकलकर
राजकुमार ले आएगा परियों को वापस
उन दानवों से छुड़ाकर
यहाँ
उनके आते ही फिर यह धरा
स्वर्ग बन जाएगी ...!
पर शायद अब ऐसा नहीं हो पायेगा...
एक एक कर
सारी परियों को लीलता जा रहा है यह दानव
अब तो परियाँ जन्म भी नहीं ले पा रही
मार दी जा रही है कोख में ही..!
हर घर में परियों को निगलने वाला एक दानव पहले से ही मौजूद जो है ...!!
एक समय आएगा
कि न तो यहाँ परियाँ होंगी ....!
और न ही...
बूत में छुपी
परियों की कहानियां सुनाने वाली कोई माँ
तब फिर कोई भी तो नहीं होगा यहाँ...?
उन आवाजों को सुनने के लिए
हम भी नहीं....
और न ही हमारी पीढ़ी.....!!!
--राकेश पाठक