सोमवार, अप्रैल 02, 2018

व्यथित करने वाली एक घटना

कई घटनाएँ है जिसने मुझे मेरे जीवन के प्रति एक नजरिया दिया..मेरे अंदर के मानव को जीवित कर दया, उपकार के कृत्य से भर दिया..मेरे अंदर जो सघन संवेदना है उसका पूरा श्रेय इसी घटनाक्रम से जुड़ा है..अगर आज मैं कुछ भी संवेदनात्मक रच पा रहा हूँ या कुछ लिख रहा हूँ या जीवन को बदल देने वाला कोई घटनाक्रम है इसके पीछे यही है..

एक सबक और टीस है जो पिछले 20 सालों से सीने में पल रही बेइंतहा तड़प और आत्मग्लानि से आज तक उबर नहीं पाया हूँ और शायद उबर भी नहीं पाऊँ.. एक तड़प है जो दो दशकों से हमें बेतरह परेशां किये हुए है....बहुत इच्छा भी है कि इस घटना का प्रायश्चित करूँ पर कैसे..??  विचार शून्य हूँ मैं..और फ़िलहाल अतीत के उस पिछले सिरे को पकड़ आत्मग्लानि से भरा बैठा हूँ। एक तड़प और बेचैनी से आँखों के कोर गीले है..अपराध बोध से ग्रस्त उस दौर की गलतियों का सिला लिए..शायद मैं मर भी न पाऊँ ठीक से..
इसके याद और तड़प में फ़ूट फ़ूट रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाता आज भी...सारी सहजता और चपलता मेरी धरी रह जाती है..बेचैनी की बेइंतहा तड़प ऐसी बेदर्द हो गयी है कि घर में अब रो भी नहीं पाता फुर्सत से.....
डॉक्टरी मदद को तरसती उन आँखों में अजीब सी बेचैनी थी पर चेहरे पर सहज मुस्कान के साथ जब उसने अपनी कहानी सुनाई तो कलेजा मुँह को आ गया...असीम दर्द से थरथरा रही पांवों में भी मदद का कोई आग्रह नहीं...स्वाभिमान से लरजती आँखों को देख कोई सहज यह अंदाजा ही नहीं लगा सकता कि इतनी असह्य पीड़ा और परिवार का बोझ लिये कोई युवक ऐसे मुस्कुरा भी सकता है....

बात 1995-96 के आस पास की होगी जब मैं रोजी-रोटी के फ़िराक में संघर्षरत था..उस दिन मैं अकेले ही किसी एग्जाम के सिलसिले में गया से पटना गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन से जा रहा था..जनरल कंपार्टमेंट में बैठा भविष्य की उलझनें और सम्भावनाओं को लेकर सोचता हुआ खिड़की की तरफ देख रहा था..7-8 और लोग भी बैठे थे..उसी में एक मुस्लिम नवयुवक भी शांत बैठा था..बातों ही बातों में उसने महेन्द्रू स्थित किसी डॉक्टर का पत्ता और जाने का रास्ता पूछा.. जब उसने यह कहा कि क्या स्टेशन से वहां पैदल जाया जा सकता है..यही से बातों का सिलसिला शुरू हुआ..फिर वह देखा समझा जिसके टीस की तड़प में आज भी जल रहा हूँ.
यह मुस्लिम युवक 8 बहनों पर एकमात्र भाई था..अब्बू पहले ही ख़ुदा के प्यारे हो गए थे..बेवा माँ औऱ आठ बहनों का बोझ लिए वह धनबाद में एक मारवाड़ी की फैक्ट्री में ड्राइवर का काम करता था..एक सप्ताह बाद ईद थी..और उसके साथ एक हादसा हो चूका था..मालिक के कांच फैक्ट्री के लैब में गलती से पूरा एसिड उसके पैर पर गिर गया था..दोनों पैर बुरी तरह जले हुए थे..पैर की हालत ऐसी की देखकर रूह कांप जाये...मालिक ने इस घटना के बाद सरकारी अस्पताल में एडमिट कर पीछा छुड़ा लिया..मात्र 10 दिन की सैलरी ही दी ...जो पैसे थे वे ईलाज में खत्म हो गए..उसके पास अब फूटी कौड़ी भी नहीं थी... उसके दोनों पैर जले हुए थे...और उधर माँ और बहनें ईद में बेटे का इंतज़ार कर रही थी..बड़ा विकट संकट में था वह..एक तरफ बहनों की ख़ुशी की ख़ातिर उसे पैसे भेजने थे और उधर अपना इलाज भी..पैसे के नाम पर कुछ भी नहीं था उसके पास.. उसने घर पर अपने साथ हुए हादसे की कोई सूचना नहीं दी थी.. वो तो भला हो उस डॉक्टर का जिसने अपने दोस्त के नाम लेटर लिख़ उसके लिये फ्री ईलाज की गुज़ारिश की थी ..उसी पत्र को लिए वह पटना आया था..उसके पास ऑटो करने के पैसे नहीं थे..उसकी स्वाभिमानी आँखों में कोई याचना नहीं थी पर पैसे के अभाव की बेबसी को सहज ही पढ़ा जा सकता था.... मुझे लगा मैं इसे कुछ मदद कर दूंगा..ताकि इसे महेन्द्रू तक पैदल न जाना पड़े...मेरे पास भी कम ही पैसे थे और 2 दिन रुकना था..इसी उहापोह में मैं यह निर्णय ही नहीं ले सका की इसे पैसे देने है..अंतर्मन कहता था जो है सब दे दो...पर मुफ़्लिसी रोक रही थी...इसी बीच हम पटना पहुँच गए थे और वह उतर चूका था...मेरा मन बहुत धिक्कार रहा था...बड़ी आत्मग्लानि हुई और उसे ढूँढना शुरू किया...मुझे उसकी बेचैन आँखे दिख रही थी..पैसे की ख़ातिर बेबस लफ्ज़ दिख रहे थे.. थी..बहनों की उम्मीदें और माँ का इंतज़ार दिख रहा है..और यहाँ मैं चंद रुपये के मोह में पड़ा रहा ...खुद को धिक्कार रहा था..अपनी बेहयाई नैतिकता को कोस फ़ूट फ़ूट कर रो रहा था मैं...यह रोना पिछले दो दशक से है...चाहता हूँ कोई प्रायश्चित करूँ...कैसे भी उसे ढूंढू ..उसके परिवार से मिलूं और पैर पकड़ अपने ग़ुनाह की माफ़ी माँग लूँ..
मुझे ईद दिखती है...दरवाजे पर टकटकी लगाए मुस्कुराते बहनों की तस्वीरें कौंधती है...उसके जले हुए पैर दीखते है...बेबस दो जोड़ी आँखे दिखती है..
आज इसका असर इतना ज्यादा है कि इसे लिख रहा हूँ और फूट फूट कर खूब रो भी रहा हूँ...आज जब भी किसी वेबस को देखता हूँ तो वो पल याद आ जाते है..और मैं असहज हो आँखों से भर जाता हूँ... आज पुनः यहां इसे लिखकर यह इच्छा हो रही है कि जाऊँ कोई अकेले स्थान पर गंगा किनारे और  इत्मिनानियत से अकेले खूब रोऊँ...

रविवार, अक्तूबर 29, 2017

भूख

रोज साँझ के चूल्हे पर
धधकती है थोड़ी आग..
जलती है रूह और
खदबदाती है थोड़ी भूख...
यह भूख पेट और पीठ के समकोण में
उध्वार्धर पिचक गोल रोटी का रूप धर लेती है..

इस रोटी के जुगत में
बेलन और चकले का समन्वय बस इतना होता है कि..
ऐंठती पेट में निवाले की दो कौर से
अहले सुबह रिक्शे द्रुत गति से दौड़
फिर किसी ज़हीन को खींच रहे होंगे...

रोटी

फुटपाथ के एक कोने में अरसे से पड़ा वह बूढा
रोटी की फिलासफी का शोध छात्र सा था..
वह था जो रोज रोटी की बात करता था...
सपनों में तस्वीरें भी उसकी गोल रोटी की होती थी...
उसके इर्द गिर्द बिखरे पन्नों में
नारे भी कई थे लिखे हुए रोटियों पर...
उसके लिखे हुए आड़ी तिरक्षी लकीरों में
भूख का ही प्रमेय और उपप्रमेय सिद्ध होता था..
पर आज कुछ उल्ट हुआ था
भूख से उथले पेट... उल्टा
आँखे तरेर टकटकी लगाए
चंद्रमा की परछाई में रोटी का परावर्तन ढूंढ़
फर्श पे दो शब्द उकेरे थे उसने "रोटी"....
शायद रोटी और भूख के प्रमेय में
मरने से पहले लिखे दो अक्षर
उसी रोटी की निर्लज्ज आहुति थी वहां...!!

     

बुधवार, अक्तूबर 25, 2017

स्त्री कोख का उपसंहार

मैं स्त्री कहता हूँ..
तुम देह सोचते हो..
मैं देह कहता हूँ..
तुम विमर्श लेकर खड़े हो जाते हो..
पुरुष और परम्परा के हवाले के साथ..

दरअसल यह देह है क्या..?
तुम्हारा ही रचा-गढ़ा प्रपंच ही तो है..?
स्त्री के सुहाग सौदर्य के निमित्त
स्त्री के लिए
खींची गयी कोई नपुंसक रेखा ..
पितृक पुरुषोक्त परम्पराओं के नाम पर स्त्री..?
और सृजन के नाम पर देह...क्यों..?

तुम कहते हो जड़ता है स्त्री..
और चैतन्य है देह..
जड़ और चैतन्यता के बीच फिर क्या..?

अपनी मनमर्जी से गढ़
थोप देते हो नियम दूसरे के माथे..
स्त्री से क्षणिक सुख और देह की पिपासा में..

स्त्री की स्वच्छंदता में भी
मौलिक जड़ता चाहते हो तुम....
क्यों आखिर..?

देह में सृजन के उच्छवास देख
ऋचाओं के गीत और हल्दी के उबटन में
कर देते हो सौदा..
मेरे देह का ही तो...???
स्त्री को मान्यताओं और रिवाजों में गूथ
सिर्फ इस लिए चौखट में बांध आते हो हमें..
ताकि स्त्री और देह के दर्प को रौंद सके बलशाली हाथ..
दरअसल वो बलशाली हाथ नहीं है
अबलों की कुंठा की
भरभरायी हुई जमीर का टूटन अंश है सुहाग के देह का रौंदना...
स्त्री को शास्त्रों और मिथकों में बांध
जीवनपर्यन्त की जिस गुलामी में बांध रखे हो न...
अब वह उन्मुक्त हो बदल रही है मान्यताएँ...
जब तुम देह की बात करते हो
तो घृणा से भर जाता हूँ मैं...
जब जना तो बच्ची के देह की परिभाषा अलग गढ़ी...
कैशोर्य हुई तो और अलग ...
मेरे युवापना में
मेरे जिस्म की मादकता को देख
देह-त्रिभुज के तिलिस्म में उलझा
मुझे स्त्री भी कहाँ रहने दिया तुमने..??
देह को सौंप स्त्री बना...
रौंद कर माँ बनाने की जिस प्रक्रिया के तेरे शास्त्र समर्थन करते है न...?
आज थूक रही हूँ उसपर मैं...

जटाजूट के लिंग पर
हर उस स्त्री का स्पर्श
उस देह का मान मर्दन है...
अतः आज मैं एक स्त्री के नाते
उस पोषित शपथ का प्रतिकार करती हूँ...
उस पलित परम्पराओं का प्रतिकार करती हूँ..
स्त्री के शापित शरीर की छिन्मस्तिका का उपहास करती हूँ...
जिसके उपसंहार में स्त्री कोख का पुंसवन है...

राकेश पाठक

अरण्य में स्त्री

मैं अरण्य की धुंध हूँ..
मैं हूँ तेरे प्रार्थना की आहुति..
मैं ज्ञागवल्लक की स्मृति हूँ..
और अहिल्या का श्राप..
अंधेरी गुफाओं में उकेरी हुई आयतें
एलोरा की यक्षिणी
खजुराहो की सृजनी.
भरतनाट्यम की एक मुद्रा लिए दासी
सूथी हुई कंदराओं का तिलस्मी स्याह पक्ष भी..
बुद्ध और आनंद का उन्माद हूँ मैं..
जो व्यक्त हुआ था धम्म के चवर में..
विपश्यना का अथर्व रखे
यज्ञ की वेदी हूँ..
धधकी हुई हवन कुंड हूँ..
होम की हुई धूमन गंध...
समिधा की लकड़ी..
जिह्वा से अभिमंत्रित शब्द
सस्वर उच्चारा हुआ मंत्र ...
भिक्षु को मिला दो मुट्ठी अन्न..
कान में दिया हुआ गुरुमंत्र..
उंगलियों में सिद्ध हुआ ऊं ओह्म
आंखों के परदे से हटा कर देखो यह तिलिस्म
कुंड की अग्नि में एक और आहुति दी है हमने भी ईश्वर..!!