शनिवार, जून 30, 2018

आत्मप्रक्षालन

यादों के कई पन्नें है...कुछ बेहतरीन दिनों के खुशगवार सफ़े है..तो शैतानियों के नाम भी दर्ज है हमारे इडियट बॉक्स में कई लम्हे..जमातों में लाईलाज शैतानों की रोज आमद होती थी ..जिनकी फ़ितरत में गुनहगारी रोज का सबब था... गन्नें के खेतों और बिना चने चुराये हम घर नहीं जाते थे...ऊपर से गालियों के बिना हमें नींद की भी बरकत रात को नहीं होती थी..खैर यह चंद लम्हें और संगतियों से छुटकारा एक अति के बाद तब मिला जब नदी में मिटटी लपेट गुजर रहे अपने स्कूल के सबसे खतरनाक नाक नक्श और खड़ूस मुछछड़ गुरूजी को हद दर्जे तक शब्दों से आहत किया...गुरूजी गुरूजी लाल तकिया...गुरूजी हग देलन भर खटिया...जैसे कई नारें भी थे..
हमलोग मिटटी लपेट इस तरह की अवांछित खूब बातें गुरूजी के घर जाते समय कहते और नदी के पानी में डुबकी लगा लेते थे..मिटटी लगे रहने के कारण गुरूजी हमें पहचान नहीं पाए..पर अगले दिन सभी नालायकों की जमकर खबर ली गयी पर हम सीधे और पढ़ाकू समझे जाने के कारण बच गए...किसी ने यह सोचा ही नहीं की ऐसा यह कर भी सकता है..एक तो मासूम चेहरा और उपर से क्लास का सबसे छोटा होने के कारण हम बच गए.. इस घटनाक्रम के बाद एक सीख के साथ मैंने जो शरारतें छोड़ी तो फिर आज तक ऐसा कोई कार्य नहीं किया...
बचपन में पिताजी बड़े कठोर थे..उनका पढ़ाना शुरू करना और हमें नींद साथ साथ आती थी फिर तो जो ठुकाई होती थी उस का तो कोई बखान ही नहीं..बाद में पिटाई छोड़कर पिताजी बेज्जती का सहारा ले खूब ब्लैकमेल किया..रात में लालटेन दे अकेले बारी पिछवाड़े दालान में) भेज देते या हमारे दोस्तों के सामने हमें नंगे कर निकालने की धमकी ने हमें काफी हद तक जिम्मेवार बनाया..साप्ताहिक या पाक्षिक पिकनिक भी तय होता था..पास के पहाड़, जंगल,गुफा,नदी,मंदिर कहीं भी हम घर और आसपास के बच्चे बड़े सब जाते थे..यहाँ दादा और पिताजी ने जीवन की बड़ी अनमोल चीजें सिखाई..

दरअसल हम अपने आस पास डब्डुंयों और बबलुओं से घिरे हुए थे जिनकी हरकारे की आदतों से हम भी मजबूर और बाध्य हो जाते थे.... शुरुआती पढाई शेरघाटी फिर रानीगंज और अंततः इमामगंज में हुई..
दादा बड़े कड़क प्रिंसिपल के रूप में ख्यात थे..और परदादा शास्त्रार्थ और यज्ञकर्ता के रूप में बहुत दूर तक पहचाने जाते थे..हमारे घर की कुल जमा पूँजी में पढाई,संगीत, साहित्य और कला ही थी...परदादा को चारों वेद कण्ठस्थ थे और वो चाहते थे हमलोग इससे कुछ और आगे बढ़े...पर बुआ और चाचा को इंग्लिश,फ्रेंच और रशियन की समझ ने हमें इन पुरातनपंथी संस्कृत से दूर कर दिया (जिसका आज मलाल भी बेतरह होती है) ...परिणामतः बुआ के हस्तक्षेप और दखल से हमें धकेल कर उस उत्तराधुनिक इंग्लिश स्कूल में ज़बरन अंग्रेज बनाने के लिए दाख़िल करा दिया गया..परिणाम यह निकला की न तो आज तक हम ठीक से हिंदी ही सीखे और न अंग्रेज ही बन पाए..  बचपन से दादाजी दो चीजों के सख़्त खिलाफ थे.. एक पापा कहने से और दूजा चाय पीने से.. बहरहाल उस डर का असर यह है क़ि आज़तक ये दोनों चीजों से हम ही नहीं पूरा खानदान दूर है...

इंग्लिश और मिशन स्कूल से होते हुए आख़िर हमारा ठिकाना उस सरकारी स्कूल में ही स्थायी मिला जो आसपास के गांव के बीच आदर्श स्कूल के रूप में जाना जाता था..मेरी बेहतरीन यादें भी इसी स्कूल से है..जिसमें क्लास बंक करने से लेकर मूवी देखने और अपने ही खेतों से टोली बना गन्ने चुराने तक की बहुत सी यादें है..

क्रमशः...

कई घटनाएँ है जिसने मुझे मेरे जीवन के प्रति एक नजरिया दिया..मेरे अंदर के मानव को जीवित कर दया, उपकार के कृत्य से भर दिया..मेरे अंदर जो सघन संवेदना है उसका पूरा श्रेय इसी घटनाक्रम से जुड़ा है..अगर आज मैं कुछ भी संवेदनात्मक रच पा रहा हूँ या कुछ लिख रहा हूँ या जीवन को बदल देने वाला कोई घटनाक्रम है इसके पीछे यही है..

एक सबक और टीस है जो पिछले 20 सालों से सीने में पल रही बेइंतहा तड़प और आत्मग्लानि से आज तक उबर नहीं पाया हूँ और शायद उबर भी नहीं पाऊँ.. एक तड़प है जो दो दशकों से हमें बेतरह परेशां किये हुए है....बहुत इच्छा भी है कि इस घटना का प्रायश्चित करूँ पर कैसे..??  विचार शून्य हूँ मैं..और फ़िलहाल अतीत के उस पिछले सिरे को पकड़ आत्मग्लानि से भरा बैठा हूँ। एक तड़प और बेचैनी से आँखों के कोर गीले है..अपराध बोध से ग्रस्त उस दौर की गलतियों का सिला लिए..शायद मैं मर भी न पाऊँ ठीक से..
इसके याद और तड़प में फ़ूट फ़ूट रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाता आज भी...सारी सहजता और चपलता मेरी धरी रह जाती है..बेचैनी की बेइंतहा तड़प ऐसी बेदर्द हो गयी है कि घर में अब रो भी नहीं पाता फुर्सत से.....
डॉक्टरी मदद को तरसती उन आँखों में अजीब सी बेचैनी थी पर चेहरे पर सहज मुस्कान के साथ जब उसने अपनी कहानी सुनाई तो कलेजा मुँह को आ गया...असीम दर्द से थरथरा रही पांवों में भी मदद का कोई आग्रह नहीं...स्वाभिमान से लरजती आँखों को देख कोई सहज यह अंदाजा ही नहीं लगा सकता कि इतनी असह्य पीड़ा और परिवार का बोझ लिये कोई युवक ऐसे मुस्कुरा भी सकता है....

बात 1995-96 के आस पास की होगी जब मैं रोजी-रोटी के फ़िराक में संघर्षरत था..उस दिन मैं अकेले ही किसी एग्जाम के सिलसिले में गया से पटना गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन से जा रहा था..जनरल कंपार्टमेंट में बैठा भविष्य की उलझनें और सम्भावनाओं को लेकर सोचता हुआ खिड़की की तरफ देख रहा था..7-8 और लोग भी बैठे थे..उसी में एक मुस्लिम नवयुवक भी शांत बैठा था..बातों ही बातों में उसने महेन्द्रू स्थित किसी डॉक्टर का पत्ता और जाने का रास्ता पूछा.. जब उसने यह कहा कि क्या स्टेशन से वहां पैदल जाया जा सकता है..यही से बातों का सिलसिला शुरू हुआ..फिर वह देखा समझा जिसके टीस की तड़प में आज भी जल रहा हूँ.
यह मुस्लिम युवक 8 बहनों पर एकमात्र भाई था..अब्बू पहले ही ख़ुदा के प्यारे हो गए थे..बेवा माँ औऱ आठ बहनों का बोझ लिए वह धनबाद में एक मारवाड़ी की फैक्ट्री में ड्राइवर का काम करता था..एक सप्ताह बाद ईद थी..और उसके साथ एक हादसा हो चूका था..मालिक के कांच फैक्ट्री के लैब में गलती से पूरा एसिड उसके पैर पर गिर गया था..दोनों पैर बुरी तरह जले हुए थे..पैर की हालत ऐसी की देखकर रूह कांप जाये...मालिक ने इस घटना के बाद सरकारी अस्पताल में एडमिट कर पीछा छुड़ा लिया..मात्र 10 दिन की सैलरी ही दी ...जो पैसे थे वे ईलाज में खत्म हो गए..उसके पास अब फूटी कौड़ी भी नहीं थी... उसके दोनों पैर जले हुए थे...और उधर माँ और बहनें ईद में बेटे का इंतज़ार कर रही थी..बड़ा विकट संकट में था वह..एक तरफ बहनों की ख़ुशी की ख़ातिर उसे पैसे भेजने थे और उधर अपना इलाज भी..पैसे के नाम पर कुछ भी नहीं था उसके पास.. उसने घर पर अपने साथ हुए हादसे की कोई सूचना नहीं दी थी.. वो तो भला हो उस डॉक्टर का जिसने अपने दोस्त के नाम लेटर लिख़ उसके लिये फ्री ईलाज की गुज़ारिश की थी ..उसी पत्र को लिए वह पटना आया था..उसके पास ऑटो करने के पैसे नहीं थे..उसकी स्वाभिमानी आँखों में कोई याचना नहीं थी पर पैसे के अभाव की बेबसी को सहज ही पढ़ा जा सकता था.... मुझे लगा मैं इसे कुछ मदद कर दूंगा..ताकि इसे महेन्द्रू तक पैदल न जाना पड़े...मेरे पास भी कम ही पैसे थे और 2 दिन रुकना था..इसी उहापोह में मैं यह निर्णय ही नहीं ले सका की इसे पैसे देने है..अंतर्मन कहता था जो है सब दे दो...पर मुफ़्लिसी रोक रही थी...इसी बीच हम पटना पहुँच गए थे और वह उतर चूका था...मेरा मन बहुत धिक्कार रहा था...बड़ी आत्मग्लानि हुई और उसे ढूँढना शुरू किया...मुझे उसकी बेचैन आँखे दिख रही थी..पैसे की ख़ातिर बेबस लफ्ज़ दिख रहे थे.. थी..बहनों की उम्मीदें और माँ का इंतज़ार दिख रहा है..और यहाँ मैं चंद रुपये के मोह में पड़ा रहा ...खुद को धिक्कार रहा था..अपनी बेहयाई नैतिकता को कोस फ़ूट फ़ूट कर रो रहा था मैं...यह रोना पिछले दो दशक से है...चाहता हूँ कोई प्रायश्चित करूँ...कैसे भी उसे ढूंढू ..उसके परिवार से मिलूं और पैर पकड़ अपने ग़ुनाह की माफ़ी माँग लूँ..
मुझे ईद दिखती है...दरवाजे पर टकटकी लगाए मुस्कुराते बहनों की तस्वीरें कौंधती है...उसके जले हुए पैर दीखते है...बेबस दो जोड़ी आँखे दिखती है..
आज इसका असर इतना ज्यादा है कि इसे लिख रहा हूँ और फूट फूट कर खूब रो भी रहा हूँ...आज जब भी किसी वेबस को देखता हूँ तो वो पल याद आ जाते है..और मैं असहज हो आँखों से भर जाता हूँ... आज पुनः यहां इसे लिखकर यह इच्छा हो रही है कि जाऊँ कोई अकेले स्थान पर गंगा किनारे और  इत्मिनानियत से अकेले खूब रोऊँ...

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