शनिवार, जनवरी 02, 2010

खुदा तेरे दरवाजे पर

हे राम ,
अल्लाह के बीच ,
वजूद तलाशता
गोयेब्ल्स की सच की तरह कड़वी
जब युग्लिना का बीज ------
उसकी किवताओ मे संकट घोल देती है
गले मे शाह जलील की पाक ताबीज ........
दंगाइयो के बीच ,
उसे मुसलमा बना
उसकी आत्मा को चिंद -चिद कर देती है .........
तब भी वह सपने मे ,
होत्री -उदगात्री बन .
यज्ञ मे कही सिज़दा कर रहा होता है ----------
तब 'काबा' और 'अल्लाह हो'की ध्वनी मे
'पान्च्ज्ञ्न्य' का ॐ गूंजता है ..
और इसी ऊं के बीच कही 'हिडिम्बा' कलमा पढ़ रहा होता है ,
'इबलीस' के लिए ............
क्या अजाजिल त्रिशूल लिए आज भी जिंदा नही ??????????

राकेश पाठक

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता को बहुत ही बारीक रेशे में बुना गया है.ज़ाहिर है, अत्यंत सावधानी पूर्वक पढना चाहिए.आज के मध्य-वर्ग की त्रासदी और कहीं न कहीं उसकी कुंठा भी इस में शामिल है.इंसानियत पुकारती है चीख-चीख कर कवि ये भी सन्देश देना चाहता है.
    भाई ज़रा वर्तनी की अशुधियां ठीक कर लो.
    नए ठिकाने की बधाई!

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