सोमवार, फ़रवरी 08, 2010

पथिक

कई दिन हो गए किन्तु व्यस्तताओं की वजह से कुछ लिख नहीं पाया .... मेरे छोटे भाई अनिश पाठक ने 2002 में एक कविता लिखी थी जो मुझे बहुत पसंद है... मुझे लगा आपके सामने रखूं..... आज आपके सामने है यह कविता ... यह कविता तब लिखी गयी थी जब भाई जल सेना की नौकरी छोड़कर आने के पश्चात, कुंठित हो मानसिक रूप से काफी विचलित था ...ये प्रेरणास्पद कविता मुझे बहुत पसंद है शायद आपको भी भाए......

भटक गए क्यों ? राही बोलो
नूतन पथ पर आकर,
हार गए क्यों ? राही बोलो
मंजिल लम्बी पाकर.
क्या तुमने देखा है ? आगे
भाग रहे है राही,
थके नहीं वे फिर भी अबतक
हटे नहीं घबराकर.
उस नन्ही पिपली को देखो
जो चढ़ती भित्ति पाकर,
डिग जाते यदि पावं उसके
फिर चढ़ती नीचे आकर.
बढ़ती रहती सदा निरंतर
नदियाँ निर्झर, निश्चल,
आ जाये अवरोध राह में
पर हार न माने चंचल.
क्या तुमने देखा है राही ?
लौटी ये आगे जाकर !
फिर बैठ गए तुम बोलो कैसे ?
राह अकेली पाकर.
ये पथिक तुम तो श्रेष्ठ हो
क्या मिलती तुमको राह नहीं ?
भटक गए यदि राह अगर तो
क्या पाने की तुममें चाह नहीं ?
उठो पथिक तुम बढे चलो
और ढूढ़ों राह निरंतर
दूर करो अँधियारा मन का
जैसे नभ में करे सुधाकर.

5 टिप्‍पणियां:

  1. rashmi prabha
    to me

    वाकई बहुत ही अच्छी कविता है

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  2. भाई जी , प्रणाम !!!
    बहुत अच्छी कविता है ! यह हमारे आगले अंक में प्रकाशित होगी !!!


    कृपया आपनी रचनाये shak.patrika@gmail.com पर भेजते रहिये...
    धन्यवाद्
    बिभूति मिश्रा

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  3. मेरे भैया
    आपने इस रचना अपने ब्लॉग में प्रकाशित कर के एक बेनाम को नया नाम दे दिया .
    धन्यवाद

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  4. समय -अभाव ही कह लो , इधर आ नहीं पाया .आया ज़रूर था .कविता भी गुनगुनाता रहा...खुश होता रहा.लेकिन दरअसल आजकल ब्लॉग-जगत में मात्र पढने से काम नहीं चलता लोग कमेन्ट के भी ख्व्हाँ रहते है, और आना उसे ही कहा जाता है.
    तो इस अर्थ में मैं आ गया.

    निसंदेह तुमने इस कविता को पढ़वाकर सिक्का जमाया है.चकित हुआ मैं!!

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