शनिवार, नवंबर 20, 2010

परछाई

आत्मशून्यता की स्थिति में होने पर कभी कभी भाषा का बहना बड़ा ही सरल हो जाता है मेरे लिए शायद ऐसा ही कुछ हुआ था इस कविता में .......




प्रतिपल प्रतिक्षण
साथ निभाती
संग संग चलती यामिनी
ओ गामिनी
कुछ देर ठहर ,रुक जा
हो जा स्वच्छंद
और कर दे मुक्त मुझे भी
अपने उस बंधन से
जो प्रतिबिम्ब बन मेरा
जकड़ रखी जंजीरों से
जंजीरों की ये कड़ कड़
मुझे तन्हाई की राग भैरवी गाने नहीं देती
ओ मेरी परछाई
छोड़ दे संग संग चलना
जी ले अब अपना जीवन
पी के मधुप्रास....
शांत उदात रात्रि के बीच
टिमटिमाता एक छोटा सा पिंड भी
घोर कालरात्रि में
 तेरे अस्तित्व बोध के लिए काफी है!!!
भले तेरा अस्तित्व मेरे से है ....
मेरे बाह्य रूप आकार को साकार करती
ओ परछाई !!!!
ठहर और उड़ जा....
 हो जा स्वच्छंद .....
अज्ञात
उस अतीव के सीमा से परे
कोसो दूर
जहाँ स्वत्व के खोज में
तथागत ताक रहा गुनगुना रहा
बुधमं शरणम्  गच्छामि
संघम शरणम्  गच्छामि ...........
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. ‎" आत्मशून्यता की स्थिति में होने पर कभी कभी भाषा का बहना बड़ा ही सरल हो जाता है " बड़ी सुन्दर बात कही आपने!
    परछाईं को मुक्त हो जाने को कहती हुई स्वत्व की खोज में लीन आत्मचेतना की यात्रा का एहसास कराती हुई सुन्दर सारगर्भित रचना!!!

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  2. bahut hi shandar .... eetani achchhi rachana padhane ko milana hamara saubhagya hai ....

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  3. गहन दार्शनिक ,सुन्दर रचना.

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