शनिवार, अक्तूबर 30, 2010

ग़ज़ल

                    ग़ज़ल
जीवन के फलसफे को पढना नहीं आया
दोस्त तेरे संग संग चलना नहीं  आया

गुजरा था कभी संग बचपने फकीरी में
वक्त बदलते ही पहचानना नहीं आया 

रहमतो की बारिश से तू बन बैठा अमीर
कह गए अबतक जीने का सहुर नहीं आया

इब्तिदा किये थे  सजदा करेंगे साथ साथ
छोड़ गए तनहा कहा रब में डूबना नहीं आया

फरमाबदार बनकर बैठे थे कलतक एक- दुसरे के
नेवला खीच कहते हो दर पे कोई भूखा नहीं आया

लिखता रहा वर्षो तलक तेरी दोस्ती के किस्से
सरेआम कह गए तुझे यारी निभाना नहीं आया

खंजर उतार सिने में लहूलुहान कर गए
बहते इन अश्को को रोकना नहीं आया

कुचले है सर राम रहीम के इस कदर
शेखेहरम बन बैठकर रोना नहीं आया 

दरिंदगी ने ने सुखा दिए अश्क मेरे इसकदर
की मुजस्समा बन बैठ मुझे हँसना नहीं आया

रोती रही राते  चीखती रही दीवारें
धमाकों की आवाज में सोना नहीं आया
  
कभी सहन में जमती रही थी महफिले रात भर
दरबदर हो गए "राकेश " से कोई मिलने नहीं आया

लिखता रहा आजीवन सभी धर्मो के मुखड़े
कह गए दोस्ती का ग़ज़ल लिखने नहीं आया

 कायनात से रुखसती का इसरार किये बैठे है
दोस्त तेरे बिना अबतक मरना नहीं आया

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