सड़कों पर बातें भी चलती है उतनी ही तेज निगाहों की तरह..
जिसके गॉसिप में मेरे और उसके संबंधों की जवानी की बातें थी..
उरोज और इमरोज़ के बीच सड़कें भी जवां रही...
जब जब भी बातें उठी इमरोज ने एक पेंटिंग बनाई
एक दूसरे से गुथे हुए प्रेमी जोड़ों की
रत और लिप्त पत्थर में उकेरी गई उन भंगिमाओं की..
हर एक पेंटिंग एक जबाब थी उन उन्मादियों को
जिन्होंने इमरोज के प्रेम से इतर कई बातें की थी..
एक प्रीतो के लिए इमरोज सिर्फ प्रेम से अलग कुछ नही था..
कुछ शब्द लिखे प्रीतो ने
उसी इमरोज़ के लिए..
जिसकी खूब बाते राहों में उड़ाये जा रहे थे...
ये दो रूह थे आदिम और हौब्बा की
सिरी और फरहाद की..
यही रूह में अवतरित थे इनदोनों में श्री..
व्यक्ति हमेशा खुद से लड़ता रहता है अपने विचारो से लड़ते, उलझते कभी खुद का खुद से ही टकराव की स्थिति में पाता है वो हमेशा चाहता है खुद से खुद को आजाद करना.....विचारो को नित्य संघर्ष काले पीले अक्षरों के रूप में.... इस इडियट्स के नए ठिकाने पर मिलेगे...
रविवार, सितंबर 10, 2017
प्रेम, इमरोज के बहानें....
दो कविताएँ सृजन और प्यार की
1
उस नवजात के पैरों में पीले फूल गुदे थे...
और हाथों में मोरपंख...
जब उसने पैर उठाये थे ...
सरसराती हवा का रंग भी पीले फूल सा खिल गया था..
जब हाथ हिलाएं तो व्योम में बादल प्रेमगीत गाते हुए विहँस रहे थे..
जब मुस्कुराया तो सबकुछ रुक गया था..
यहां तक ईश्वर का मौन भी..
सृष्टि जब जब सृजन का गीत गाती है
सबकुछ थम जाता है श्री..
2
मेरे हाथ कुछ भी नही थे
काया के अंतरण का शून्य भी मैंने निर्वासित कर दिया था
हर एक उच्छवास के साथ
एक पल और मुक्त रहा मैं
पर रूह को भरने की एक आर्त पुकार
रोज सुनता था...
कानों के परदों में इस गूंज की गुनगुनाहट से
रोज़ ही निर्वासित करता था खुद को.
एक दिन मैंने ही कहा था...भर दो अगाध मेरे भीतर ये सब..!
उन्होंने शब्दों, ध्वनियों, आह्वानों की एक नदी छोड़ दी..
तंत्रों, मंत्रो, कापालिकों का तर्जन छोड़ दिया..
गीत, गात्र-उदगात, संगीत का तर्पित अवोहम छोड़ दिया.
पंडित और मौलवी से दीक्षित वह परम्परा भी छोड़ दी
संग, उत्स, त्योहार का दीक्षांत भी छोड़ दिया..
गेहूं, गुलाब, ज्ञान का सौभाग्य भी छोड़ दिया..
कनेर, कंसूल, गुलाब में जो जीवन ढूंढ़ा था मैंने
उसे भी उसी गंगा में समूल उसी दिन छोड़ दिया था
जिस दिन परम्परा के नाम पर मेरे अभिमानों को रौंद दिया था तुमने..
सुनो मैंने सब छोड़ा सिवाय प्रेम के..
प्रेम की सिवाय कुछ भी नही मेरे पास..
बारिशो के फुहार से आज भी भर जाता हूँ मैं..
रूहानी हवाओं से मेरे गीले मन आज भी ऊष्मा से तर जाते है..
पश्चिम से आती हर हवा में भरी हुई मादकता के साथ
आज भी प्रेम से ही भरा हुआ रहता हूँ मैं सखी..
चुप्पी
हमारी हर चुप्पी की कीमत थोड़े से आँसू है..
हमारी हर चुप्पी सवालों के घेरे में हैं..
हमारी हर चुप्पी का मूल्य किसी की कलमें चुकाती है.
हमारी हर चुप्पी की कीमत तय है
कलमों के गिरहबन्द में उसी चुप्पी का रहस्य है..
हमारी हर आवाज पर पहरेदारों के साये है..
आवाजें सींकचों में बंद है..
कलमें हथकड़ियों से बांध दी गयी है
हमारी चीखें वंदे मातरम में गुम हैं
हमारी शोर बहुत कीमती है
हिटलर की हँसी की तरह...
कत्लगाहों के शोर में दबा दी गयी है हमारी चीखें...
अखबारों की कतरनों के बीच दम तोड़ रही है हमारी कलमें...
भयग्रस्त ..हर एक उठाए गए हाथों पर छाले है..
गूंगों के विपक्ष में महाभारत के पात्र है..
दम तोड़ते बच्चे में एकांगी मौत का नृत्य है..
गुनाहों के देवता की गवाह स्याह काले हो गए पूर्व ही..
न्याय की कागजों पर स्याही फेर दी गयी..
और हम चुप रहे उस सभ्यता के ख़िलाफ़
जब बोलना था तब भी चुप रहे उस व्यवस्था के खिलाफ...
कल हम चुप हो जाएंगे..
या कर दिए जाएंगे...
अगर हम आज भी इसी तरह चुप रह गए तब...!
हमें भी कतारों में खड़ा होना चाहिए
हमें भी उस इंक़लाब का इस्तकबाल करना चाहिए..
जिसमें विरोध..विरोध..और विरोध हो अपनी हक हकूक की...!!!
बुधवार, अप्रैल 26, 2017
मेस आयनक
मेस आयनक..
---------------------
यह कांधार है..
जहाँ जमीं में बुलबुले नहीं है..
न फ़ाख्ता की चहचह
न सोन चिरैया के गीत..
है यहाँ सूनापन अथाह सरकटी का..
दबी है बारूद की सुरंगे और वाहियात सपनें
दबी है उन सुरंगों में लिजलिजाते हुए अवशेष..
उन आतातायियों के..
जिन्होंने धर्म को क्रुसेड से जोड़
फूंक दी थी मानवता
उस सूर्ख़ हो चुकी मिट्टी में..
मजहब की मकतीरे नहीं रही थी सिर्फ
है भग्नावशेष एक समृद्ध इतिहास का...
जेहाद के नाम पर फूकीं गयीं
भग्नावशेषों में अब भी अश्वश्थ की तरह खड़े थे अहिंसापों के दर्प..
जिसके अस्तित्व में बोध का सौंदर्य था..
और ध्वनि रंध्रों में संघ शरण के वक्तव्य..
विहारों में दबे पड़े थे
यान परम्पराओं की ऋचाएँ
अहिंसा के ये बीजतत्व
अब ध्वस्त कर दिए गए थे..
वामियानों में लगी बारूद की शिराओं का एक कोना..
इस कांधार के ध्वनाशेष की नींव है.
सूर्ख़ मिट्टी में उगे बबूल पर
रक्त की चिश्तिया चिपचिपा रही थी..
कहीं नहीं थे मुस्कुराते बुद्ध..
पुरातत्ववेदा की सनक में ढूंढी गयी
"मेस आयनक" का इतिहास
ढूंढे गए इस शहर में अंहिसा के गहरे रक्त थे..
जैन अस्तित्ववादियों के णमो ओंकार
और बुद्ध के मुस्कुराते मुख़ौटों का
पूरा आगत अवशेष था बिखरा हुआ यहाँ...
तथागत के प्रहसन के बीच
गिरते थे बाबा वली पर्वत के छोरो,ढलानों से
संघ,शरण, शरणागत के उच्छवास ....
वही पर निकलता है लसलसा चिपचिपा
बैंगनी,नीले, हरे रंग का थोथा..
इस तांबे के तूतिये में
मोगलम पूजा के बीज भी थे
जिसके हौले से छन्न की आहट से
खिलखिला उठते थे बुद्ध..
आज वहाँ बन्दूकों की दस्तरख़ाने बिछी थी..
जलायी जा रही थी जिस्मानी रूह..
चीख़ रही थी उम्मीदें बचपन की.
इस शेष,अवशेष, भग्नावशेष के बीच भी
ढूंढ दी गयी थी एक 'मेस आयनक'
एक बौद्ध नगर..
क़ातिल आवाजों के बीच
एक पागल पुरातत्ववेदा द्वारा..
राकेश पाठक
रविवार, अप्रैल 23, 2017
बुद्ध की गवाही
हमनें हवा में आज कई सवाल उछाले..
नदियों, पर्वतों, वनालिकों के लिए...
हमने अलग अलग भी सवाल पूछे
इन नदियों, पर्वतों और वनों से..
हमनें पूछी इनके रुकने, टूटने और उजड़ने की वजहें..
पहले नदियों से पूछा उनका अतीत..
कहा इतिहास की नदी जीवित कर
दो मेरे सवालों के जबाब..
क्यों और किसने उजाड़ा तुम्हें..?
किसने की तुम्हारी हत्याएँ..?
जबाब से पहले भर गयी वो..
कहा जब बेध रहे थे मुझे
तब पर्वतों ने मेरी मदद नही की...
साथी बारिशों ने मेरा वेग छीन लिया..
मेरी हत्याएँ इन्द्र ने करवाई हैं..?
समुद्रों ने भी लील लिया मुझे..
भगीरथ पुत्रों ने भी जी भर लूटा हमें..
हम नितान्त अकेले थे.
तब कोई खड़ा नही हुआ मेरे साथ..
और इस तरह मैं मार दी गयी असमय ही...
मैं पर्वत के पास गया और
पूछा यही सवाल
की कैसे कर दी गयी तुम्हारी हत्याएँ..?
तुम कठोर थे
कैसे इतनी जल्दी आत्मसमर्पण कर दिया तुमने..?
इतनी निर्ममता से मारे जाने के बाद भी फटे क्यों नही तुम..?
उसने कहा जब मैं तोड़ा जा रहा था
तो वनों और नदियों ने नही की मेरी कोई मदद..
इन्द्र और वरुण ने भी मेरे आत्मा में फिट किये गए डायनामाइट को और सुलगने दिया..
इस तरह अकेले ही संघर्ष कर हार गया मैं..
मेरे हार और प्रतिकार दोनों के ही मूक गवाह बन खड़े देखते रहे ये लोग...
फिर मैनें वनों से पूछा उसके उजड़ने की वजहें..
कि क्यों जला कर नेस्तानबूद कर दिए गए तुम..
कहा जब मैं जलाया जा रहा था तो
नदियों ने नही की मेरी कोई मदद
पर्वत मुझे उजड़ते देखते हुए भी चुप रहे..
वरुण ने अपनी हाहाकारी हँसी से और धधकाई आग..
इंद्र ने कोई कसर नही छोड़ी मुझे नष्ट करने में..
कोई हाथ भी नही उठे मुझे बुझाने को
बल्कि इन हाथों ने कुल्हाड़ियां थाम मार डाला हमें..
और इस तरह मैं भी नष्ट हो गयी..
दरअसल ये नष्ट होने की कहानी कोई एक की नही थी..
यह अलग हो बिखरने से नष्ट हुए थे सब..
सबने इन्द्र की गलती मानी..
एक शासक की लापरवाही और अपने कर्तव्य से विमुख होने का संगीन आरोप था इन्द्र पर..
हमने इन हत्यायों पर
नदियों से मांगी उनकी गवाही..
हमनें पर्वतों से मांगे कोई साक्ष्य..
हमनें वनों को कहा प्रमाण दो...
हमनें इन्द्र से उसकी संलिप्तता के आरोप पर जबाब मांगे..
हमने वरुण के आरोप पर भी स्पस्टीकरण माँगा..
ताकि सच्चाई से रूबरू हो हम जान सके
पर्वतों, नदियों और वनों की हत्यायों में संलिप्तता किसकी रही..
नदी ने भगीरथ और बुद्ध को अपना गवाह चुना..
पर्वतों ने भगवान शिव से गवाही लेने की मंशा दी...
और वनों ने कंदराओं में ध्यानमग्न साधूओं और ऋषियों को अपना गवाह कहा..
अदालत ने बुद्ध को बुलाया..
बुद्ध ने कहा वे ध्यानमग्न थे उन्हें कुछ नही पता..
भगीरथ ने गंगा के अवतरण में व्यस्त बताया खुद को..
शिव ने कहा वे सती के वियोग में दुखी थे इसलिये वे कुछ नही देख पाए..
वरुण ने अपने राजाज्ञा की बात कह मुकर गए अपने आरोप से..
इन्द्र ने विपक्षी दानवों का षड्यंत्र बता बदनाम करने का आरोप लगाया...
संतो ने मौन साधना की बात कह कुछ कहने से मुकर गए...
इस तरह एक निर्दोष जनों की हत्याओं पर कोई आरोप अदालत में तय नही हो पाया..
सब अपनी जबाबदेही से बचने का कोई न कोई उपाय निकाल बच गए..
शासकों और जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेवारी से मुकर गए
इस तरह से साक्ष्य रहने के वावजूद भी सत्ता के षड्यंत्र में लिप्त लोग बेगुनाहों की हत्याओं से बरी हो गए...
अदालतें कुछ भी निर्णय नही कर पायी..
क्योंकि सत्ता के नियंता बुद्ध, शिव और इन्द्र के ख़िलाफ़ फैसले लेने की हिम्मत उस न्याय कोर्ट में नही थी...
इस तरह एक और फैसला उस जन, जंगल, जमीन के खिलाफ गया..
और लोकतंत्र फिर हार गया...
जनतंत्र फिर से ख़िलाफ़त में असफल रहा..
अदालतों में बैठे तानशाह बाहर खिड़कियों से
नदी, पर्वत-पहाड़, वन के लटके चेहरे पर उपहास का मंत्र बुदबुदा रहे थे..
बुधवार, नवंबर 30, 2016
प्रतिरोध की कविता
प्रतिरोध की कविता
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यह कविता नहीं है ..
यह नाटक भी नहीं है..
यह कविता और नाटक के बीच झूल रही रौद्र बतकही है ...
इसमें पात्र तो है पर कोई अभिनेता नहीं.. और न हीं अभिनय..
नाटक के पात्र की तरह
एक अदना सा,छोटा आदमी
प्रवेश कर..
जब अभिनय की भंगिमा शुरू करता है.. तब हमसब हतप्रभ, भौचक्का हो चुपचाप तमाशा देखते हैं ..
कब यह तमाशा-किस्सागोई
सच्चाई के बेहद करीब
यथार्थ में ले जाता है
हमें पता ही नहीं चलता ...
लोग दिखते हैं ..
भीड़ भी दिखती है ..पर सब निहत्थे..
किसी के हाथों में बंदूकें नहीं थी ...!
न हीं खंजर ...!
और न हीं नश्तर..
जो डरा सके किसी को ...!
वह दुश्मन की तरह लग रहे थे..पर थे नहीं...!
उनके दुश्मन थे कई..
सरकारें भी उनके खिलाफ थी..
क्योंकि वो सरकार की बात नहीं करते थे...
गण के उस हाशिये के हिस्से की बात करते थे..
जहाँ सरकार नहीं पहुँच रही थी..
जंग में सारी आताताई सेना झोंक दी थी सरकार ने उनके खिलाफ..
पुरे खलुस और मरहूद के साथ...
उस निहत्थे मानुषों के विरुद्ध..
सरकार ने तलवारें तान रखी थी..
मिसाइलों का मुख भी उसकी ओर था.. समस्त राजशाही की ताकत उनके खिलाफ खड़ी थी
पर वे डिगे नहीं..
और न हीं हारे--
और न हीं टूटे...!
उनकी आवाज में इतनी असीम ताकत थी
कि पुरा गण खड़ा था उनके साथ
निहत्था ही...!
उस आतातायी, तानाशाही सत्ता के खिलाफ...
जो विरोधियों को कुचलने में मार्क्सवादियों से भी क्रूर थी...
हवा में उठे हरेक हाथ को काट दिया करता था वो..
उस क्रूर आतातायियों के कानों ने हमेशा सुने थे ...
जयकारों की आवाज..
चाटुकारों की आवाज..
लोलुपकारों की आवाज..
व्यापारों की आवाज...
पर...!!
आज उस निहत्थे के आवाज के खिलाफ..
सेना चुप थी---गण बोल रहा था...!
राजा चुप था--प्रजा बोल रही थी...!
मंत्री चुप थे-- परिषद् बोल रही थी...!
उन निहत्थों की आवाज में
इंकलाब थी उस देश की...
जहाँ बन्दूकें बोल रही थी जनाब...!!
मंगलवार, अगस्त 18, 2015
रेत के भुरभुराहट की तरह नहीं ढ़हता प्रेम ....!!
जो फिसल जाओगे वक्त के साथ...
तुम वह भी नहीं
जो ढ़ह जाता है
एक छोटी सी चोट से...
या वह
जो भुरभुरा कर
बदल लेता है अपना वजूद...
तुम हवा भी नहीं हो
जो बहा ले जाओगे हमें
इस समंदर से दूर...
कि...
सागर के प्रेम से पगा हूँ मैं
रत नमी से इस कदर
कि...
तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
तुम सूखा भी नहीं सकते
धूप में मुझे
एहसास से इस कदर तीता हूँ मैं
कि...
तुम भी गीले हो जाओगे
मेरे साथ साथ
तुम मुझे बहा भी नहीं सकते
क्योंकि मैं जुदा नहीं होना चाहता
तुमसे कभी
संग संग चलना चाहता हूँ अंत तक
रहता हूँ तुम्हारे वजूद के साथ ही
हां! अगर मैं मिटूं
या बहूँ
या सुख जाऊ
तो समझ लेना
प्रेम का झरना सूख गया होगा मेरे अंदर
या कोमा में चली गयी होगी याद मेरी
या सूली पर चढ़ा दी गयी होगी फिर कोई मोहब्बत
या चुन दिया होगा किसी मुग़ल ने फिर से
...........................................
कुछ नहीं है मेरे पास...
सिवाय तेरे...!
यह जो "तुम" हो न ...
यही तो ख़ास है
मेरी कुल जमा पूँजी
मेरा-तुम्हारे का एहसास से भरा
बस.....!
--राकेश पाठक
बुधवार, जुलाई 29, 2015
गंगा के तट पर उपजी एक प्रेम कथा का कुछ भाग
तब भी क्या समय था ! तेरे शब्दों और ख्यालों में ही तो जीता था मैं ..
!!!!
कितने ही पत्र लिखे मैंने ...!
आरजु विनती कर करके थक गया था मैं..!
पर तुम कहाँ सुनती थी ..?
पर आज देखो न ...साथ हो तो लग ही नहीं रहा ..की तुम (वही) हो
कैसे झिड़ककर चल देती थी तब....माय फूट कहकर ..!
आँखों में नमी लिए उदास सा फिर कुछ लिखने लग जाता था मैं .. एक आस के साथ..!
जानती हो ...?
तुम्हारी माय फूट कहने का जो स्टाइल था न उफ़्फ़!!!
गुस्सा दिखाते हुए..जब पैर पटक कर, झिड़कते हुए तुम निकल जाती थी और मैं गीले आँखों से तड़प उठता था।
सच कहूँ तो तुम्हारा "माय फूट" कहने की जो अदा थी न उसी से मुझे प्यार हो गया था।
यह सुनना की फिर कुछ लिखकर पकड़ा देता था नीरू को ...
मनुहार ..मान के साथ दे देना उसे ..!
मेरी आँखों की नमी देखकर वो भी मना नहीं कर पाती थी ..!
पर तुम भी न कितना अभिनय करती थी ...?
पहले पूरा पत्र पढ़ना...पढ़ते ही तेरा "हूँ" करके पैर पटकना ....
तुम्हें कैसे पता यह सब ..?
नीरू ही तो बताती थी यह..
यही जो चीज थी न जिस से मुझे लगता था की कहीं न कहीं कुछ तो अंकुरित हो रहा है मेरे लिए।
अच्छा ...!!
जब प्यार नहीं था तो मेरे पत्र पढ़ती क्यों थी ..?
जानते हो ..!
आज पहली बार कह रही हूँ तुमसे ...!
सचमुच में मैं तुमसे प्यार करने लगी थी ...!
तुम्हारे शब्द भी न ..!!!
उफ़्फ़ वेवश कर देते थे मुझे ..
और यही मैं नहीं चाहती थी कि वेवश सा दिखूं किसी के आगे ...!
पैर पटककर निकलना अभिनय मात्र नहीं था सिर्फ ..!
मेरे वजूद को लील जाने वाला अहं था मेरा..!
मेरा अहं ..मेरा गुरुर का कारण ये पुरुष ही तो थे ..
उनके निगाहों की टकटकी से उपजी हुई ..झूठा दर्प ...
इसे मैं अब समझ पा रही हूँ ..!
पुरुषों का ऐसे एकटक देखना मुझे अच्छा लगता था।
इसके बिना कहाँ मैं ...?? कोई देखे न तो बेचैन हो जाती थी मैं ..! मुझे लगता था मेरे इर्द गिर्द ही तो दुनिया है इन पुरुषों की ।
पागलपन के हद तक तड़पते देखना चाहती थी मैं इन्हें..
पर यह जो तुम्हारे भेजे ख़त ...उनमें लिखे शब्द ऐसे थे ..की मैं बेचैन हो जाता था।
मेरे अहं ...वज़ूद के निष्कर्षण के ध्रुव थे यह शब्द।
पर आज कहूँ नरेन् ..!!
शायद तुम मेरे लिए ही बने थे ...
तुम न होते तो मैं भी न होती..!!
और मैं ... "मैं"...!
यही कहा करते थे न !
पर "तुम" न होते
तो हम भी न होते !!
न यह मेरा अहं
अब मैं इसलिए हूँ
की तुम हो ....
टूट कर कहाँ कोई जी पाता है किसी से ??
साथ छोड़कर कहाँ कोई जा पाता है कभी ..??
यादों को पकड़े रहते है साथ साथ
जीवन भर..
सांसपर्यन्त...
फिर एक समय आएगा
जब न तुम "तुम" रहोगे
और न मैं "मैं" रहूँगा..!!
"मैं" होना अहं का होना है बस ..!
पर "हम" होना सब होना है ..!
जीवन चक्र के अगली चरण की एक कड़ी..!!
.....राकेश
क्रमशः
एक पिता का पत्र... पिता के नाम .....!!!
पिताजी मैं 2005 से ही घर से बाहर हूँ। नौकरी और कैरियर के चक्कर में। उलझता चला गया लगातार किसी न किसी कार्य में । फिर शादी...बच्चे ...उनकी ज़रूरतें और अब अपनी नयी गृहस्थी सवांरने में उलझा हूँ। आप अकेले पड़ गए है अब। यही कहते है न ?? छोटा अनीश भी कहाँ है अब गावँ में ...वो भी दूर है कानपूर में... नित्य के झंझटों में फंसा पड़ा हुआ... मुझे मालूम है की जब दो दिन फ़ोन नहीं करता हूँ तो मम्मी कितना बेचैन हो जाती है ...चिंतित हो कैसे कहती है मन बड़ा उद्विग्न है आज। बात कीजिये न ...! तब आपलोगों के जुड़ाव की तीव्रता और स्नेहासिक्त हाथ की नमी यहाँ महसूस कर मैं भी तो बेचैन हो जाता हूँ।
पिताजी आप जानते है कि मैं आप से कभी कुछ नहीं कह पाता था और न आज भी कह पाता हूँ....यहाँ तक अपने मन की बात भी । माँ ही माध्यम होती थी कुछ कह पाने का और शायद आज भी वैसा ही कुछ है मेरे भीतर। कुछ कह पाने का झिझक आज भी उसी रूप में है। न जाने क्यों कुछ भी मांग नहीं पाता आपसे..? ऐसे स्वतः इतना कुछ देते रहे है कि कभी जरुरत ही नहीं हुई।
आज जब दो बच्चों का पिता हूँ तब समझ पा रहा हूँ कि बेटे की ममता और दूर होने की तड़प क्या होती है। जुड़ाव क्या होता है और उस जुड़ाव में दूरी कितना कष्ठप्रद होता है। यह कविता शायद उसी बेचैनी, कष्ठ और मनोभाव से उपजी हुई है जो एक पिता अकेले में महसूस करता है। जो मैं कभी कह नहीं पाया वह इस कविता में व्यक्त हुई है ...एक पिता का दर्द और तड़प जो मैं अब समझ पाया ...एक पिता होने के बाद....!
रोज सुबह सुबह मेरी चीजें ग़ुम हो जाती है
कभी सिरहाने रखा चश्मा ..
तो कभी तुम्हारी दी हुई घड़ी..
या किंग्सटन का वह पेन..
या चाभी का वह गुच्छा ..!
जिसमे तेरे बचपन के खिलौने का बॉक्स अंदर बंद पड़ा है..!
पहले वो चश्मा ही है जो
सुबह उठते ही सिरहाने ढूंढता हूँ..!
ताकि उजास के बीच पढ़ लूँ ..
तुम्हारा भेजा कोई ख़त..
या कोई मेल..
या एस एम् एस..
पर हर दिन की तरह ही
टल जाता है ..
अगली उम्मीद पर .
या अगले दिन के इंतज़ार में ..!
यह चश्मा भी है न..!
तेरी मीठी याद से ही तो जुड़ा है..!
याद है..!जब डॉक्टर ने कहा था
चश्मा ले लीजिये अब
तब तपाक से तुमने कहा था ..
मेरे गुल्लक में बहुत से पैसे है
उसी से चश्मा ख़रीद लो न पापा ...!!
बर्थ डे गिफ्ट की तरह ..
जो देते रहे हो हर साल मुझे..!
आज मेरी ओर से ले लो न पापा..!!
मुस्कुरा कर तेरे इस भोलेपन पर मर मिटे थे हम
यही तो है तेरी यादों का इडियट बॉक्स...
जो अक़्सर जेहन में आते ही कोर गीले हो जाते है मेरे ..!!
पर न जाने क्यों....
दूरियों से..अपनों का संवाद भी...
कितना दूर होता जा रहा है अब...!!
जब गए थे...तो रोज ही बात होती थी ..!
पर दूरियों..ने शायद पीढ़ियों के बीच
एक लकीर खींच दी हो ..!
व्यस्तताओं के दरमियाँ की ...!!
रोज सुबह सिरहाने और भी कई चीजे गुम हो जाती है मेरी
तुम्हारी दी हुई वह घड़ी ..
और उधार लिया हुआ या माँगा हुआ वक्त भी..
दोनों मुझसे आँख मिचौली करते है रोज..!
पर मैं हूँ की वक्त को ही बाँध रखा है ...
घडी की सुइयों के साथ..
यादों के बीच अटकाकर ..
पर कब तक ??
कोई न कोई घड़ीसाज आकर
बंधे हुए वक्त को फिर से दुरुस्त कर देगा..!
रह जायेगी तो फिर वही इडियट बॉक्स में जमा तुम्हारी यादों का गुणसूत्र
जिस में निषेचन का न तो कोई भविष्य है
और न ही हम दोनों के इंतज़ार के इंतहा का कोई अंत ही इसमें..!
टेबल के दराज में फड़फड़ाते पीले लिफाफे पर दर्ज
होस्टल का तेरा अस्थायी पता का हरेक हर्फ़......
बेतरह याद है आज भी मुझे...!
इंतज़ार भी है किसी ख़त का ...
आ जाये शायद फिर ??
और रोज अपनी जगह से
एक परत भी स्मृतियों का उधेड़ दे रही है
पर अगर कुछ गुम नहीं हो रही है तो वो है तेरी अल्हड़पन की यादें
शरारतें और बुना हुआ याद सहर...!!
अपने जीने के तरीके
आखिर क्या है जो रोज ढूंढते रहते हो
अनु की आलमारी में ..
जानते हो तेरी सभी चीजे कैसे करीने से लगा रखी है ज्यों की त्यों ...
जहाँ है वही है आज भी ..
वह तेरी ड्राइंग की कॉपी
जिसपर स्कूल के टीचर ने कभी एक्ससिलेन्ट लिखा था।
वह ट्रैक शूट भी
जिसे पहनकर तुमने कॉलेज में शील्ड जीती थी
शील्ड को रोज ही छूकर तलाशते है तुम्हें ..
शायद तुम्हें याद नहीं हो
पर जब तुम छोटे थे
मेरी उंगली पकड़ जिद्द पर अड़ जाते थे
गुड़ में पगी गुझिया के लिए
बिना लिए मानते कहाँ थे तुम ..?
वारिश हो या धूप
रोज का यह नियम था तेरा
आज भी रोज गुजरता हूँ
हलवाई के उस दुकान के पास से
पर कुछ भी नहीं खरीद पाता ...सिवाय आँसू के ..
जब वापस घर लौटता हूँ
तेरी माँ भी सुना देती है दस बात...
ओह ...!!!
और फ़फ़क पड़ती है वो भी
कुछ कहते हुए...
उन्हीं यादों से गुजरते हुए ....
एक सिलसिला सा है यह रोज का..
आलमारियों में भरे है गुब्बारों के पैकेट
और हैप्पी बर्थ डे वाली रंगीन मोमबत्तियाँ भी
अमूल के डब्बे में रखी
मॉर्टन टॉफी का एक्सपायरी डेट कब का निकल चूका है रखे रखे ही
पर पड़ी है यथावत यो ही ....!
तह की हुई गुजरी यादों के साथ
जीवन गुजारना कितना मुश्किल होता है
एक पिता के नाते मैं अब जान पा रहा हूँ
स्मृतियों के ऊँची दीवारों में कैद
आख़िर कब तक जी पायेगा ..?
बच्चा होता हुआ तेरा यह बाप ...
कभी कभार ही सही एक ख़त लिख दिया करो
या कोई मेसेज भेजकर ही ढूंढ़ लेना अपने
पापा का मुस्कुराता चेहरा
जो कभी तेरे स्कूल के बाहर
धूप में खड़े हो
हँसता हुआ मिल जाता था
शायद
तब मेरी कोई भी चीज गुम नहीं होगी
कही से ...कभी भी ...!
हाँ मैं बेटी ही हूँ जो मार दी जाती हूँ......!!!!!
रुई के फाहों से घर भर गया था मेरा...
सफ़ेद सफ़ेद...
नर्म नर्म...
मुलायम मुलायम...
चारों ओर...
खो गया था मैं
झक सफ़ेद उन फाहों में...
ख्बाब थे कभी यहाँ के...
स्वर्ग था धरती का यह...
इन उजले फाहों के साथ ही
खूब बातें करते थे....परियों के देश की...
रख आता था अँधेरे परकोटे पर 'पर' काटकर...
फिर न तो..वह भाग पाती थी और न ही
जी पाती थी
रो रो कर जीना उनकी नियति बन जाती थी...!
कभी उन परियों के बारे में...
तो कभी उस राजकुमार के बारे में...
असीम ताकतों से भरा...
सुन्दर सजीला नौजवान...
हवा से बात करते घोड़ों पर सवार
दक्ष तलवारबाज
जादुई ताकतों से लैश
और बचा ले आएगा उन परियों को
कैद कर रखी गयी है अबाबिलों द्वारा...!!
हर साल आसमान से...
उन परियों के आँसू भरे संदेशे होते थे
उस राजकुमार के लिए...
जमघट लगा...
बनाने लगती थी
पुतले
वैसे ही बूत......!
इन बुतों से निकलकर
राजकुमार ले आएगा परियों को वापस
उन दानवों से छुड़ाकर
उनके आते ही फिर यह धरा
स्वर्ग बन जाएगी ...!
एक एक कर
सारी परियों को लीलता जा रहा है यह दानव
मार दी जा रही है कोख में ही..!
कि न तो यहाँ परियाँ होंगी ....!
और न ही...
बूत में छुपी
परियों की कहानियां सुनाने वाली कोई माँ
तब फिर कोई भी तो नहीं होगा यहाँ...?
उन आवाजों को सुनने के लिए
हम भी नहीं....
और न ही हमारी पीढ़ी.....!!!
सोमवार, मई 25, 2015
वामियनों के देश में प्रेम
ऐ सुनो..!!
नए हो ..?? नहीं ..!!
हाथ में ..चमकती पन्नियों में
क्या है तेरे पास ..??
दिखाओं...??
लाल गुलाब ...!!!
मार दिए जाओगे...
काट दिए जाओगे...
टाँग देगें तुझे ...!
हदीस का हवाला देकर
सरेआम ...!!
देश में उसेमाओं ..उल्लेमाओं ने
लोगों के हाथों में लाल कटारे थमा रखी है..
रक्तरंजीत---!!
प्रेम है इन्हें सिर्फ अदम से..
वहशीपना से...सनकीपना से..
वन..बन्दूक..तलवारों से...
इल्म है इन्हें इत्लाफ़ से सिर्फ..
जाओं,भागों यहाँ से
प्रेम का गुलाब...!!
अमन का आंदोलन...!!
प्यार की ख़ुशबू...!!
बंद है "वामियानो"के देश में ...!!
"बजरंगियों" के देश में ...!!
"दामनियों" के देश में ..!!
हाँ ..!!
जानता हूँ भाई....
तो क्यों .. आये हो मरने ..?
मरने नहीं ...!! मारने आया हूँ..
मुल्क के अबाबिलों को
इन लाल गुलाबों से
इनकी मादक सुगंध के नशे में
कहाँ रह पायेगा प्रेम का काफ़िर कोई ..??
खेतों में लहलहाता गुलाब चाहता हूँ..
फूलों का मुस्काता मिज़ाज चाहता हूँ ..
प्रेम में रीता भींगा तन मन चाहता हूँ..
पग पग दिखता अमन चाहता हूँ..
अच्छा ...!!!
तुम सपने बेचते हो ..??
बेचोगे यहाँ ...???
दुकानें बंद है सपनों की यहाँ..
मोटी हदीस के जंजीरों से..
जालों का संसार है यहाँ वर्षों से..
सपने देखोगे ...!!
तो चाक दिए जाओगे
ख़ाक दिए जाओंगे
अंतिम बार कहता हूँ ...
चले जाओं यहाँ से ...
.........................
.........................
सन्नाटा..
एक शान्ति
रोज़ रोज़ मरने से अच्छा है-
आज मर जाना ..काफ़िर बनकर
सपने और प्रेम की ख़ातिर...!!!
शनिवार, अप्रैल 11, 2015
क्या लिखू !!!!
गद्य लिखूं
सच लिखूं
यक्ष लिखू
गीत लिखूं
लफ्ज लिखू
शेष लिखूं
अशेष लिखूं
ख़ुशी लिखूं
हँसी लिखूं
उम्र लिखूं
ताउम्र लिखू
भाव लिखूं
आव लिखू
प्रीत लिखूं
प्यार लिखूं
मीत लिखूं
रीत लिखूं
धुन लिखूं
गुण लिखू
देव लिखूं
दास लिखूं
शील लिखूं
भील लिखू
इंद्र का दरबार लिखूं
गीता का सार लिखू
वीणा का तार लिखूं
बांसुरी का रंध्र लिखूं
गोविन्द का छंद लिखूं
मौला का मकरंद लिखूं
राधा का रास लिखूं
मीरा की आस लिखूं
साँस लिखूं
खास लिखूं
पाश लिखूं
काश !!लिखूं...!!!
मंगलवार, अगस्त 19, 2014
आखिर बहन इरोम तेरी जीत हुई!!!!
पिछले सप्ताह "कतरनें" में "मेरी बहन शर्मीला" पढ़ा। किसी भी संवेदनशील, मानवीय ह्रदय को झकझोर देने लायक सारी बाते थी इसमें । इस आलेख के लिए आवेश जी बधाई के पात्र है। इसे पढ़ते ही मन उद्वेलित हो उठा। व्यथित मन इतना ज्यादा कभी नहीं रोया था। तत्काल ही आवेश जी से बात हुई और शर्मीला के समर्थन में कुछ करने की इच्छा। मजदूरों के हक़ और अधिकार के लिए लड़ी गई लडाई के १२० वीं वर्षगाठ से अच्छा और क्या हो सकता था इसी का परिणाम है की आज यह ब्लॉग आपके सामने है ...........उसी रात लिखी एक कविता की पहली पोस्टिंग भी हुई।
इस ब्लॉग के माध्यम से हमें उन मुद्दों को उठाना है जो मानवाधिकार हनन से जुड़े हो तथा उन जैसे लोगो को एक मंच प्रदान करना है जिन्हें लगता है की उनकी आवाज गूंगी-बहरी सरकार और मीडिया नही सुन रही है वो अपना दर्द यहाँ बाँट सकते है। इस ब्लॉग से मैं उन सभी लोगो को आमंत्रित करता हूँ जिन्हें देश प्रिय हैं , जो भारत के है और भारत उनका है। जिन्हें गाँधी आज भी अच्छे लगते है। जो शर्मीला को जानते है व इसके लिए कुछ करना चाहते है, उसके समर्थन मे हर उठने वाले हाथ को ताकत देना चाहते है । कलम से ही सही ! यथासंभव जितना हो सके अधिक से अधिक लोगो तक, सरकार के पास और कानून नियंताओं तक यह बात पहुचाई जाए की विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र मे आज भी मानवाधिकार बूटों तले कुचला जा रहा है ,जहाँ मानवाधिकार सशस्त्र बल की रखैल बन आसाम में मुजरा कर रही हों , संगीनों के साए मे जहाँ बचपन घुट रहा हो। हथियारों के दम पर जहा गाँधी जी के बेटियों की अस्मत लूटी जा रही हो। महात्मा बुद्ध के विचार जहाँ हिचकी ले रहा हो । मानवाधिकार का यह खेल गाँधी के उस देश मे पिछले कई दशको से जारी है ................वहां कैसी सरकार.....???? और कौनसा मानवाधिकार ?????? बिगत आठ वर्षो से भारतमाता की एक बेटी उत्तर-पूर्व के लोगो के अस्मिता ,आत्म -सम्मान और गरिमा वापस दिलाने के लिए लगातार संघर्षरत है। क्या हमारा दायित्व नही बनता की उसके हाथ को मज़बूत करें ??? उसे नैतिक शक्ति दे ! मैं देश के उन युवायों से कवि पाश की इन पंक्तियों के साथ आह्वान करता हूँ की .......
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से मर जाना
न होना तड़प का !!
सव सहन कर जाना
सवसे खतरनाक होता हैं
हमारे सपनो का मर जाना
बिलकुल सही है हमें अपने सपनो को मरने नहीं देना है बलिक दूसरो को बुनने में मदद करना है। हम उनसभी से आह्वान करते है की उत्तर-पूर्व में जबतब लागु कर दिए जाने वाले सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून -१९५८ को पूर्णतः हटाने के लिए पिछले आठ सालो से भूख हड़्ताल पर बैठी "इरोम शर्मीला" के समर्थन में आगे आयें। अपने तरीके से विरोध दर्ज कराये। उसे ताकत दे ,उसके गांधीवादी तरीके के पक्ष में खड़े हो सरकार को झूकने को मजबूर करे . पत्र लिखे, नुक्कड़ पर जुटे, गोष्टी करे, शिकायत करे. दोस्तों को बताये की इरोम शर्मीला के साथ क्या हो रहा है??? हमें आपनी आवाज विश्व पटल तक पहुचानीं हैं ताकि महिला अधिकारों का, उनके अस्मिता की ,उनके अधिकारों के हनन को रोका जा सके। मै मानता हूँ की हर समय की अपनी चुनोतियाँ होती है चाहे वह यथार्थ चेतना, जनचेतना, जनांदोलन, जनमानस के लड़ी जा रही कोई लडाई ही क्यो न हो। हर समय अपने विचारो को अपने विचारो से ही मुठभेड़ होती रहती है। आज हम चका-चौंध और भागदौड में इतने मस्त हो गए है की हमें अपने आसपास ,पड़ोस,देश समाज के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं । दो कमरे के फ्लैट में सिमटा आदमी आज स्थितिप्रज्ञ बन कर रह गया है आज सव सुरक्षित जीवन चाहते है लेकिन वाह्य यथार्थ के आतंक ने व्यक्ति को एक आयामी,कमज़ोर और पंगु बना दिया है हम जितने ही अपने आपको सुरक्षित करने का प्रयास करते है उतनी ही असुरक्षा और भय अपने आस पास बुनते रहते है बिना समाज को सुरक्षित किये हम सुरक्षित नहीं रह सकते ....जरुरी है समाज के मुद्दों पर पर कदमताल करना, अतः जागे ,उठे और शर्मीला की ताकत बनें खुद की न सोचकर देश, समाज की सोचे आज स्थिति यह है की
लोग संगमरमर हुए/ह्रदय हुए इस्पात
वर्फ हुई संवेदना ख़तम हुई सब बात।
हमें खुद के स्वभिमान को जगाना है दुष्यंत कुमार के शव्दों में ...
जम गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए .......
आज शर्मीला अकेले अपने दम पर अपने भागीरथी प्रयासों से सरकार को नाको चने चबाने को मजबूर कर दिया है हमें भी चाहिए की उसका हाथ से हाथ और कदम से कदम मिलाकर साथ दे ।मैं एक बार फिर उन नवयुवको से ,छात्रो से आह्वान करता हूँ की जिस तरह सतर के दशक में देश में भूचाल ला दिया था आज दुवारा वो हुंकार भरे .... आज मै उस माँ को भी सलाम करता हूँ जिसने इतनी बहादुर, जांबाज,और दिलेर बेटी पैदा की।
कवि पाश की इन पंक्तियों के साथ की साथी हम लड़ेगे .........हम आपके साथ है .....
हम लडेंगे साथी,अपने स्वभिमान के लिए
जब बन्दूक न हुई तो तलवार होगी
जब तलवार न हुई ,लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ ,लड़ने की जरुरत होगी
हम लडेंगे जबतक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकि है ....
हम लडेंगे ......???
की लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता
हम लडेंगे की अभी तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेगे अपने सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वालों की याद जिन्दा रखने के लिए
हम लडेंगे .....हम लडेंगे साथी
राकेश पाठक
शनिवार, जून 04, 2011
वृक्ष की कथा-व्यथा
आओ आज सुनाता हूँ मैं
अपना दुखड़ा अपनी जुबानी
धरती के वाशिंदों की
लालच लोभ की स्वार्थ कहानी
एक सुबह मै जागा
उठकर बाहर था मै भागा
देखा भीड़-भाड़ खड़ी थी
हाथ में कुल्हाड़ी पड़ी थी
आये थे मुझे काटने
हरियाली सब लुटने
मै बोला चिल्लाया
हाथ जोड़ गिड़गिड़ाया
भैया मत काटो
मुझे मत लूटो
अरे!मै ठहरी बादल की रानी
मै देती वर्षा और पानी
और मुझे तुम लूट रहे हो ?
अंग-अंग को कूट रहे हो
अरे मै जिन्दा तो धरती जिन्दा
हरी भरी धरती वाशिंदा
सोचो काट कर क्या पाओगे ??
क्या प्रदुषण से लड़ पाओगे ???
प्रदुषण की मारी धरती पर
कौन बचेगा जिन्दा ??
मर जायेंगे रहनेवाले
नहीं बचेगा कोई वाशिंदा !!!.
सोचो मै क्या-क्या करता हूँ
मै देता पंक्षियों को प्रश्रय
अन्न जल तुमको देता हूँ
मै देता सांसों को जीवन
ठंढक भी मै पहुँचाता हूँ
बादल का संगी बनकर
वर्षा रानी को बुलबाता हूँ .
सूर्य की हानिकारक किरणों का
आघात ह्रदय पर सहता हूँ.
पर तेरे जीवन पर कभी भी
संकट नहीं आने देता हूँ .
CO2 को सोख-सोख कर
शुद्ध आक्सीजन देता हूँ
वाहनों के निकले धुयें से
बचने का कवच बनाता हूँ
पर तेरे स्वार्थ ने मेरे दिल में
छेड़ बड़ा कर डाला
मेरी ओजोन छतरी बिंध-बिंध कर
प्रदुषण का जहर शरीर में डाला
बोलो कैसे मै जीवन दूंगा ??
तुमसब को पालूंगा कैसे
जब CO2 की अधिकता से
तापमान धरती का बढ़ जायेगा
पिघल जायेंगे सौर ग्लेशियर
धरती पर प्रलय आ जायेगा
बाढ़, सुखाड़, भूखमरी से
बोलो कैसे तुम बच पोयोगे ??
मै कहता हूँ मत काटो
मुझे रहने दो, मुझे जीने दो
कभी बादल काले घुमड़-घुमड़ कर
नदियाँ नाले भर देते थे
पर आज नदियाँ सूख गयी स्त्रोतों से
धरती हो गयी सूखी बंजर
बोलो तुम क्या दोगे अगली पीढ़ी को
निर्जन बंजर जलविहीन जीवन
या तपती धरती जलते उपवन
क्या यही शिला मेरे सेवा का
पेड़ काटकर तुम दोगे ??
अतः मान लो अपनी हार
नहीं करो वृक्षों पर प्रहार .
अगर पेड़ लागाओगे तुम
सुख तुझे मै सब दूंगा
जीवन खुशियों से भर दूंगा
आयों आज ये प्राण करे
वृक्ष नहीं कटने देंगे
धरती के कण-कण आँगन में
हरियाली हम कर देंगे .....
सोमवार, मार्च 21, 2011
होली की हास्य व्यंग कविता
श्री सीमेंट चौराहे पर
भीड़ जुटी मस्तानो की
जब होली का चंग बजा
चौराहे पर हुरदंग मचा
तब शुक्ला जी पिचकारी उठायें
बीच भीड़ में नज़र आयें
जोशी जी पर तान पिचकारी
धीरे -धीरे कमर लचकाएं
बोले जोशी जी तुम भी आओ
संग-संग ठुमका लगाओ
पिए भांग की मस्ती में
दोनों आ गए गश्ती में
जोशी बोले मै नाचूँगा
मुन्नी बुलाओ तो ठुमका लगाऊंगा
ये सुनकर जे.के.जैन आये
मुन्नी बन वो खूब शर्मायें
तब चंग पर थाप लगी
अंग-अंग पर आग लगी
उधर से संजय जी आयें
थोडा झिझके थोडा मुस्काएं
फिर लगा चढ़ने होली की मस्ती
उतर गए जब सारी सुस्ती
बोले भैया होली खेलो
दिल के बंद दरवाजे खोलो
संजय जी की मस्ती देखकर
शर्मा जी भी कूद पड़े
हाथ गुलाल गालो पे मलकर
मुन्नी से वो गले मिले
तब मुन्नी ने काटी चिकोटी
शर्मा जी की खुल गयी लंगोटी
लिए लंगोटी शर्मा जी भागे
बाप-बाप करते वो आगे
बोले मुन्नी बदमाश बहुत थी
टूट गयी जो आश थी उनकी
फिर वापस शुक्ला जी आये
महफ़िल में खूब रंग जमायें
बोले " हवा" कुछ फगुआ गाओ
छोडो भांग कुछ और पिलाओ
कुछ और के चक्कर में
हवा जी फस गए घनचक्कर में
हवा जी की सारी हवा निकाली
भीड़ ने सारी पैग पी डाली
बोले अब मै क्या करूँगा
रात "शमा" से कैसे निबटूंगा
थप्पड़ तक तो सह लेता हूँ
इस बेलन से कैसे निबटूंगा
एक भी ठीक से पड़ गयी तो
तीन दिन मै उठ न सकूँगा
फिर उन्होंने एक राज खोला
क्यूँ रखते वो दाढ़ी वो बोला
खालो कितना मार बीबी से
दाढ़ी में सव छुप जाता है
छुप जाते है दाग थप्पड़ के
चेहरा खिला-खिला लगता है
नहीं विश्वाश पूछो शर्मा से
बाते कितनी ये गहरी है
बोलो जगमोहन इस बात में
सच्चाई कितनी छुपी है ??
तभी लिए रंगों की लाठी
ठुमक-ठुमक राठी जी आये
कोठारी जी के कोने पर
घुडनृत्य की महफ़िल सजाएँ
बोले मै तो नहीं हटूंगा
पावर लेकर यही रहूँगा
तभी चंग टोली निकल पड़ी
साहेब के बंगले चल पड़ी
अब वहां प्रेम -मनुहार होगा
थोड़ी छेड़-छाड़ थोडा फाग होगा
कुछ अच्छा मिलेगा खाने को
पर खाने पर संकट होगा
भीड़ -भाड़ में स्टाल पर
लोगो का खूब जमघट होगा
लोग भेखे पेट टूट पड़ेंगे
हाथो में वर्तन होगा
फिर मजलिश जमेगी मूर्खो की
मूर्खो का नामकरण होगा
रजनीकांत-विनय वाणी से
मूर्खो का नाम नयन होगा
जो एक साल तक सोचेंगे
गाली दे दे कोसेंगे
ऐसा नाम रखा क्यूँ तुने
इसी बात पर रोयेंगे
फिर ढूंढेंगे संपादक को
और बदला चुन-चुन कर लेंगे
पुरे एक साल तक संपादक
गायब रहेगा पन्नो से
पर अगली होली वो फिर आएगा
नया रूप वो दिखलायेगा
अब तुम भी खिसक लो यहाँ से रोशन
बंगले के पीछे दरवाजे से
ढूंढ़ रहे सब डंडा लेकर
शर्मा,शुक्ला जोशी जी
बहुत निपोरी दातें सबने
अब टूटेगी तेरी बतीशी जी ..
